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उड़द की खेती के इस उपयुक्त समय में बंपर पैदावार की राह में एक ‘दुश्मन’ छिपा बैठा है. गेहूं की कटाई के बाद खाली खेतों में उड़द की बुआई तो फायदेमंद है, लेकिन एक विशेष कीड़े का प्रकोप पूरी मेहनत पर पानी फेर सकता है. क्या है वह कीट और उससे बचाव का अचूक तरीका?
किसानों को पारंपरिक खेती के साथ दिमाग लगाने की भी जरूरत है. वर्तमान में उड़द की खेती का उपयुक्त समय है. जिसे किसान कम समय में अच्छी पैदावार प्राप्त कर सकते है. जिसे किसान गेहूं या रबी की फसल कटने के बाद खेत खाली रहने की बजाय किसान इसमें उड़द की बुआई कर सकते हैं.

कृषि वैज्ञानिक डॉ. अखिलेश शाह ने लोकल 18 को बताया कि उड़द की खेती के लिए बलुई दोमट या दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है. इसमें मिट्टी का पी एच मान भी मिल भूमिका निभाता है. पलामू जैसे क्षेत्र की मिट्टी में पानी का निकास अच्छा रहता है, जिससे पौधों की जड़ें स्वस्थ रहती हैं. गर्म और हल्की नमी वाली जलवायु उड़द की अच्छी पैदावार के लिए अनुकूल होती है.

आगे कहा कि किसी भी फसल की खेती में किस्म बेहद ज्यादा मायने रखते है. जिसमें किसानों को अच्छी और ज्यादा पैदावार के लिए उन्नत किस्मों का चयन करना बेहद आवश्यक है. उड़द की खेती के लिए किसान टी-9, पंत यू-19, पंत यू-30 और पीयू-31 जैसी किस्मों की बुआई कर सकते हैं. जो कि कम समय में तैयार होती हैं और रोगों के प्रति भी काफी हद तक सहनशील मानी जाती हैं.
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आगे कहा कि उड़द की बुआई करने से पहले खेत को अच्छी तरह दो से तीन बार जोतकर भुरभुरा बना लें. इसके बाद पाटा चलाकर जमीन को समतल कर दें. बीज को लगभग 3 से 4 सेंटीमीटर गहराई में बोना चाहिए. पंक्ति से पंक्ति की दूरी करीब 25 से 30 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 10 सेंटीमीटर रखना बेहतर माना जाता है.

उन्होंने बताया कि खेत की अंतिम जुताई के समय गोबर की सड़ी हुई खाद डालना लाभकारी होता है. जो कि जैविक खाद के रूप में लाभ देता है. इसके साथ ही आवश्यकता अनुसार नाइट्रोजन और फास्फोरस का प्रयोग किया जा सकता है. उड़द की फसल को अधिक पानी की जरूरत नहीं होती, लेकिन फूल और फल बनने के समय हल्की सिंचाई करने से पैदावार बेहतर होती है.

आगे कहा कि उड़द की फसल में पीला मोजेक रोग और कीटों का खतरा रहता है. इससे बचाव के लिए समय-समय पर खेत की निगरानी जरूरी है. जरूरत पड़ने पर कृषि विशेषज्ञों की सलाह से कीटनाशकों का छिड़काव करना चाहिए. स्वस्थ बीज और संतुलित खाद का उपयोग भी रोग से बचाव में मदद करता है.

उन्होंने कहा कि एक एकड़ में उड़द की खेती करने में लगभग 8 से 12 हजार रुपये तक की लागत आती है. इसमें बीज, खाद, मजदूरी और सिंचाई का खर्च शामिल होता है. कम लागत और कम समय में तैयार होने वाली यह फसल छोटे और मध्यम किसानों के लिए उपयुक्त मानी जाती है.

उन्होंने कहा कि उड़द की फसल करीब 60 से 70 दिनों में तैयार हो जाती है. एक एकड़ से औसतन 4 से 6 क्विंटल तक उत्पादन मिल सकता है. बाजार में उड़द की अच्छी कीमत मिलने पर किसान एक एकड़ में 20 से 30 हजार रुपये तक का मुनाफा कमा सकते हैं. इसलिए मार्च में उड़द की खेती किसानों के लिए एक लाभदायक विकल्प साबित हो सकती है.
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