दादा-परदादा से चला आ रहा यही काम
भेड़ का दूध गांव में खास माना जाता है, अगर किसी का एक्सीडेंट हो जाए या घुटनों में दर्द हो तो लोग दूध लेने आ जाते हैं. 80, 100 या 120 रुपये प्रति लीटर मिल जाता है. कोई गरीब आ जाए तो फ्री में भी दे देते हैं, वह मुस्कुराकर कहती हैं. भूरदत्त बताते हैं, “सुबह 10 बजे निकलते हैं और शाम 7 बजे घर लौटते हैं. महीने के आखिर में मुश्किल से 4 से 5 हजार रुपए बचते हैं. उसी में बच्चों की फीस और घर का खर्च निकलता है.” वो आगे जोड़ते हैं, “दूसरों की नौकरी मुझसे नहीं होती. अपना काम है तो मन भी लगा रहता है. दादा-परदादा से यही काम चला आ रहा है, छोड़ने का मन नहीं करता.”
भूरदत्त के पास दोगली नस्ल की बकरियां भी हैं, एक बकरी करीब 20 हजार की आती है. भेड़ों में फागी नस्ल सबसे अच्छी मानी जाती है, दूध अच्छा देती है और सेहत भी बढ़िया रहती है. चार फुट की भेड़ भी 20 हजार तक बिक जाती है. मौसम कोई भी हो, रुकना नहीं. जब लोग गर्मी में घर के अंदर पंखे या एसी में रहते हैं, हम जंगल में भेड़ों के साथ होते हैं. बरसात हो या ठंड, रोज़ निकलना पड़ता है. सविता और भूरदत्त की शादी को 15 साल हो गए हैं, भूरदत्त हंसकर कहते हैं, “मैं 35 साल का हूं और मेरी पत्नी 34 की है. ये हर समय साथ रहती है, किस्मत वालों को ऐसी पत्नी मिलती है. मेहनत बहुत है, कमाई कम है, लेकिन अपने काम की इज्जत अलग होती है.” आखिर में भूरदत्त की एक बात सब कह जाती है: “कम हो या ज्यादा, अपना रोजगार अपना ही होता है.”
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