Faridabad Latest News : फरीदाबाद के नवादा गांव में सब्जियां तैयार खड़ी हैं लेकिन खरीदार नहीं मिल रहे. गोभी, मूली और धनिया औने-पौने दाम पर भी नहीं बिक पा रहे. लागत बढ़ रही है और आमदनी घट रही है. कई किसान मंडी तक फसल ले जाना भी घाटे का सौदा मान रहे हैं. हरियाली अब चिंता का कारण बन गई है.
खेत लहलहा रहे, बाजार में सन्नाटा
नवादा गांव के खेतों में इस समय गोभी फूल चुकी है. मूली मिट्टी से बाहर झांक रही है. धनिये की खुशबू भी चारों तरफ फैली हुई है. लेकिन इन सब्जियों को खरीदने कोई नहीं आ रहा. किसानों का कहना है कि मंडी तक ले जाने का किराया भी नहीं निकलता. ऐसे में फसल काटकर ले जाना भी घाटे का सौदा बन गया है.
इटावा से फरीदाबाद तक उम्मीदों का सफर
किसान गोविंद सिंह मूल रूप से इटावा यूपी के रहने वाले हैं. पिछले चार पांच साल से फरीदाबाद में खेती कर रहे हैं. शुरुआत में उन्हें लगा था कि यहां सब्जी की खेती में अच्छा मुनाफा मिलेगा. लेकिन अब हालात यहां भी मुश्किल हो चुके हैं. आसपास के अधिकतर किसान इसी संकट से जूझ रहे हैं.
लागत बढ़ी, दाम गिरे
गोविंद बताते हैं कि गोभी की फसल पर करीब 20 से 25 हजार रुपये खर्च हो गए. खेत पट्टे पर लिया है जिसका किराया 50 हजार रुपये प्रति एकड़ सालाना है. बीज खाद दवाई सिंचाई और मजदूरी का खर्च अलग है. इस बार स्कॉटा कंपनी का बीज लगाया था. उम्मीद थी बेहतर पैदावार होगी. लेकिन 40 किलो की गोभी की एक पन्नी सिर्फ 40 से 50 रुपये में बिक रही है. लागत निकलना तो दूर उल्टा नुकसान हो रहा है.
धनिया और मूली की हालत और खराब
धनिये में करीब 20 हजार रुपये का खर्च आया. लेकिन एक रुपये गड्डी भी कोई लेने नहीं आ रहा. मजबूरी में धनिया खेत में ही छोड़ दिया गया. मूली का भाव भी दो रुपये किलो तक गिर चुका है. गोविंद कहते हैं कि अगर गोभी 20 रुपये किलो मूली 10 से 15 रुपये किलो और धनिया 4 से 5 रुपये गड्डी बिके तभी कुछ राहत मिल सकती है.
परिवार का सहारा सिर्फ खेती
गोविंद सिंह की उम्र 32 साल है. वह शादीशुदा हैं और छह बच्चों के पिता हैं. पूरा परिवार खेती पर निर्भर है. हर साल 50 से 60 हजार रुपये का घाटा उठाना पड़ता है. छह महीने की फसल में ही लाख रुपये से ज्यादा खर्च हो जाता है. लेकिन आमदनी उम्मीद से बहुत कम रहती है. ऐसे में परिवार चलाना मुश्किल हो रहा है.
उम्मीदें टूटती जा रहीं, हरियाली बनी घाटे की कहानी
गोविंद कहते हैं कि अगर यूपी में फायदा होता तो यहां क्यों आते. वहां भी खेती में कुछ नहीं बचा था इसलिए फरीदाबाद आए थे. लेकिन अब यहां भी वही हाल है. नवादा गांव के अन्य किसान भी इसी संकट का सामना कर रहे हैं. मेहनत के बावजूद जब सही दाम नहीं मिलता तो उम्मीद कमजोर पड़ने लगती है. खेतों की हरियाली अब किसानों के लिए खुशी नहीं बल्कि घाटे की कहानी बनती जा रही है.
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