अब कुछ दिनों से उस जगह पर एक फोड़ा उभर आया था. कविता ने घरेलू नुस्खे के तौर पर लेप लगाकर पट्टी बांधी. कुछ दिनों बाद जब फोड़ा फूटा, तो उसमें से यह गोली निकली. महिला अब पूरी तरह स्वस्थ है. परिवार के लोग इसे चमत्कार मान रहे हैं. डॉक्टरों का कहना है कि बुलेट एक मैटेलिक ऑब्जेक्ट है, जो शरीर के अंदर रह सकता है. यह गोली एसएलआर राइफल की है.
कविता अब चार बच्चों की मां हैं. उनका कहना है कि उन्हें कभी पता ही नहीं चल पाया कि उन्हें गोली लगी है, और न ही कभी कोई दिक्कत महसूस हुई. अब वह उस गोली को संभाल कर रखेंगी, क्योंकि लोग उनके पास उसे देखने आ रहे हैं. वह अपनी हथेली पर गोली रखकर हंसते हुए कहती हैं, “मैंने इसे 20 साल संभाला है.”
12 साल की उम्र में लगी थी महिला को गोली
गांव के पास था आर्मी ट्रेनिंग कैंप
कविता बताती हैं कि हमारे गांव के पास में एक आर्मी ट्रेनिंग कैंप था. जहां पर ट्रेनिंग कराई जाती थी. लगता है कि वहीं से आकर गोली मुझे लगी थी, लेकिन किसी को उस समय भरोसा नहीं था कि गोली लगी है. मुझे भी पिछले 20 साल से किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं हुई. मुझे खुद पता नहीं था कि मेरे शरीर के किसी हिस्से में गोली भी लगी होगी.
कविता बताती हैं कि हमारे गांव के पास में एक आर्मी ट्रेनिंग कैंप था.
शादी के बाद 4 बच्चे हुए कविता का विवाह
कविता का 2012 में एनआईटी की डबुआ कॉलोनी के रहने वाले प्रदीप के साथ हुआ. प्रदीप एक निजी कंपनी में ड्राइवर हैं. प्रदीप ने बताया कि उनके चार बच्चे हैं, जिनमें तीन लड़कियां और एक सबसे छोटा बेटा है. प्रदीप भी हैरान हैं और इस बात की खुशी जताते हैं कि उनकी पत्नी को लगी गोली बिना किसी ऑपरेशन के अपने आप ही निकल आई. उन्होंने यह भी बताया कि गोली उस स्थान से कुछ दूरी पर निकली है, जहां पर पहले लगी थी.
दो महीने पहले जांघ में फोड़ा उठना शुरू हुआ
प्रदीप ने बताया कि करीब 2 महीने पहले मेरी पत्नी को कमर के नीचे के हिस्से (जांघ) में एक फोड़ा उठना शुरू हुआ. हमने पास के ही एक डॉक्टर से दवाई ली, लेकिन कोई आराम नहीं हुआ. इसके बाद 2 दिन पहले पड़ोस की एक आंटी के कहने पर उसकी पत्नी ने घरेलू लेप किया. जब उसकी पत्नी ने गौर से चेक किया तो फोड़े के अंदर एक नुकीली नोक दिखाई दी. जिसको उसने हाथ से पकड़ कर खींचा तो वह चीज बाहर निकल आई.
फोड़े से निकली गोली देख सब हैरान प्रदीप बताते हैं कि फोड़े से नुकीली चीज को ध्यान से देखा तो पता चला यह तो गोली है. जब उसने उसे बाहर निकालकर घरवालों को दिखाया तो सभी के होश उड़ गए, क्योंकि वह बंदूक से निकली हुई एक गोली थी. इसके बाद कविता को एहसास हुआ कि 20 साल पहले स्कूल के समय पर उसको पत्थर नहीं गोली लगी थी.
उधर, बादशाह खान सिविल अस्पताल के न्यूरो सर्जन डॉ. उपेंद्र भारद्वाज ने बताया कि ऐसा होना संभव है, क्योंकि बुलेट एक मैटेलिक ऑब्जेक्ट है. जब गोली निकलती है, तो उसमें कोई जहर नहीं होता, वह बस एक गरम लोहे का टुकड़ा होती है. कई बार, गोली शरीर के हड्डी वाले हिस्से में रुक जाती है. ऐसा गोली की रफ्तार कम होने पर होता है. हमारी कोशिकाएं गोली के चारों तरफ एक तरह की दीवार खड़ी कर देती हैं, जिससे गोली वहीं पर रुकी रहती है. संभवतः कविता को जो गोली लगी है, उसकी गति अधिक नहीं रही होगी, जिसके कारण गोली जहां लगी, वहीं अंदर रुक गई.
कोशिकाओं की परत फटी और गोली बाहर आ गई
गोली के अपने आप बाहर आने के सवाल पर डॉ. उपेंद्र भारद्वाज का कहना है कि इसका कोई निश्चित समय नहीं बताया जा सकता कि गोली कितने समय बाद अपने आप निकल जाएगी. कविता के मामले में त्वचा और गोली के बीच कोशिकाओं द्वारा बनाई गई परत फट गई होगी, जिससे संक्रमण हुआ होगा और एक गांठ बन गई. इससे गोली का आगे का रास्ता साफ हो गया और वह बाहर की तरफ निकल आई.
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