लिट्टीपाड़ा प्रखंड मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर पहाड़ी वादियों में बसा बांसजोड़ी गांव आजादी के 75 साल बाद भी विकास की मुख्यधारा से कटे होने की पीड़ा झेल रहा है। बड़ा घघरी पंचायत के इस गांव में आदिम जनजाति पहाड़िया समुदाय के 36 परिवार रहते हैं, जि
दूषित पानी पीने को मजबूर लोग
बांसजोड़ी गांव में शुद्ध पेयजल की स्थिति बेहद चिंताजनक है। आज तक गांव में एक भी चापाकल नहीं लगाया गया है। पूरी आबादी जर्जर कुएं और आसपास के झरनों के दूषित पानी पर निर्भर है। इससे ग्रामीणों, खासकर बच्चों और बुजुर्गों के स्वास्थ्य पर लगातार खतरा बना हुआ है। ग्रामीणों का कहना है कि कई बार प्रशासन से गुहार लगाई गई, लेकिन पानी की समस्या आज भी जस की तस बनी हुई है।
सड़क नहीं, इसलिए योजनाएं भी गांव से दूर
गांव को मुख्य सड़क से जोड़ने वाली करीब 5 किलोमीटर लंबी सड़क अब तक नहीं बन पाई है। गांव के भीतर केवल 100 फीट पीसीसी सड़क बनी है। सड़क नहीं होने के कारण किसी भी सरकारी योजना का लाभ समय पर नहीं मिल पाता।
स्वास्थ्यकर्मी और आंगनबाड़ी सेविकाएं नियमित रूप से गांव नहीं पहुंच पातीं, जिससे आंगनबाड़ी केंद्र का संचालन प्रभावित है और पोषाहार का वितरण भी ठीक से नहीं हो रहा। वर्षों से दर्जनों प्रधानमंत्री आवास अधूरे पड़े हैं। डाकिया योजना का चावल भी सड़क के अभाव में गांव तक नहीं पहुंच पाता।
बीमारी में खटिया ही एंबुलेंस, रोजगार पर बिचौलियों का कब्जा
स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली का आलम यह है कि गर्भवती महिलाओं और गंभीर मरीजों को आज भी खटिया या चारपाई पर लादकर 5 किलोमीटर दूर हातिबथान मुख्य सड़क तक ले जाना पड़ता है। गांव में रोजगार के अवसर बेहद सीमित हैं और बिचौलिए पूरी तरह हावी हैं। ग्रामीण पहाड़ी फसलों—बरबटी, बाजरा, सुतनी, अरहर और मकई के सहारे जीवन यापन कर रहे हैं।
प्रशासन से सड़क और डीपबोरिंग की मांग
गांव के प्रधान बासु पहाड़िया, एलेरी पहाड़िन, शांति पहाड़िन, माड़गी पहाड़िन, बैदा पहाड़िया, गासी पहाड़िया, धर्मा पहाड़िया, सुरजा पहाड़िया सहित दर्जनों ग्रामीणों ने प्रशासन से गांव तक सड़क निर्माण और डीपबोरिंग कराने की मांग की है। ग्रामीणों का कहना है कि अगर बुनियादी सुविधाएं मिल जाएं, तो उनकी जिंदगी में भी बदलाव आ सकता है।
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