इच्छा मृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) को लेकर सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद पीजीआई में वर्ष 2009-10 में बनाई गई विशेषज्ञ कमेटी और उसकी गाइडलाइन एक बार फिर चर्चा में आ गई है।
करीब डेढ़ दशक पहले संस्थान ने ऐसे मामलों में निर्णय लेने के लिए स्पष्ट प्रक्रिया तय की थी ताकि लंबे समय से वेंटिलेटर या लाइफ सपोर्ट पर पड़े मरीजों के मामलों में चिकित्सकीय और नैतिक आधार पर फैसला लिया जा सके।
सुप्रीम कोर्ट ने जिस युवक हरीश राणा के मामले में हाल ही में लाइफ सपोर्ट हटाने की अनुमति दी है, वह 2013 में चंडीगढ़ के सेक्टर-15 की एक पीजी में हादसे के बाद पीजीआई में भर्ती रहा था और लंबे समय तक गंभीर हालत में उसका इलाज चला था। उस समय संस्थान के पल्मोनरी मेडिसिन विभाग के प्रमुख रहे डॉ. सुरेंद्र जिंदल ने बताया कि पीजीआई ने 2009-10 में ही विशेषज्ञों की एक कमेटी गठित कर ऐसे मामलों के लिए गाइडलाइन तैयार कर ली थी।
डॉ. जिंदल ने कहा कि कई बार मरीज लंबे समय तक लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर रहता है और परिवार बेहद कठिन मानसिक स्थिति से गुजर रहा होता है। ऐसे मामलों में यदि परिजन इच्छा मृत्यु की मांग करते हैं तो बिना तय प्रक्रिया के निर्णय लेना मुश्किल हो जाता है। इसी को देखते हुए संस्थान ने पहले से ही एक व्यवस्थित प्रणाली विकसित की थी ताकि निर्णय पूरी तरह चिकित्सकीय तथ्यों और नैतिक मानकों के आधार पर लिया जा सके।
दो नजदीकी परिजनों की सहमति आवश्यक
गाइडलाइन के मुताबिक यदि किसी मरीज के परिजन इच्छा मृत्यु की मांग करते हैं तो सबसे पहले परिवार के कम से कम दो नजदीकी सदस्यों की सहमति आवश्यक होती है। इसके बाद विशेषज्ञ डॉक्टरों की एक टीम मरीज की क्लीनिकल स्थिति का विस्तृत मूल्यांकन करती है। डॉक्टर यह सुनिश्चित करते हैं कि मरीज की स्थिति स्थायी रूप से अपरिवर्तनीय है और उसके ठीक होने की संभावना लगभग समाप्त हो चुकी है।
इस प्रक्रिया में अलग-अलग विभागों के विशेषज्ञ शामिल होते हैं और सामूहिक रूप से निर्णय लिया जाता है। सभी चिकित्सकीय और नैतिक पहलुओं पर विचार करने के बाद ही लाइफ सपोर्ट हटाने, यानी विथड्रॉल ऑफ लाइफ सपोर्ट, की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाता है।
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