सिंदरी की बसंती देवी मेहनत की मिसाल हैं. दोनों हाथ नहीं होने के बावजूद उनकी शिक्षिका बनने की यात्रा बहुत ही दिलचस्प है. वह पिछले 18 सालों से लगातार बच्चों को पढ़ा रही हैं. आइए जानते हैं उनके जीवन की यात्रा……
मां बनी सहारा, बेटी को मिली नई ज़िंदगी
बसंती देवी धनबाद जिले के सिंदरी विधानसभा क्षेत्र की रहने वाली हैं. जन्म से ही हाथ न होने के कारण उन्हें समाज की टीका-टिप्पणी और तिरस्कार भरी निगाहों का सामना करना पड़ रहा है. यहां तक कि जब वह छोटी थीं तब लोगों ने उनकी मां को उसे मार देने की सलाह तक दे डाली थी. लेकिन मां ने हिम्मत नहीं हारी और बसंती को जीने और आगे बढ़ने का मौका दिया. आज वही बसंती अपने परिवार की पूरी आर्थिक जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठाए हुए हैं और सम्मान के साथ जीवन जी रही हैं.
100 से अधिक बच्चों को दे चुकी है शिक्षा
बसंती ने अपनी शुरुआती शिक्षा पैरों से लिखकर राजेंद्र हाई स्कूल, शाहपुरा बाजार (एफसीआई) से पूरी की. इसके बाद श्यामा प्रसाद मुखर्जी कॉलेज से आगे की पढ़ाई पूरी की. घर की आर्थिक स्थिति कमजोर थी, इसलिए उन्होंने सिंदरी के क्वार्टर्स और घरों में जाकर ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया. बसंती बताती हैं कि उनका बचपन से एक ही लक्ष्य था. एक दिन शिक्षक बनकर समाज में बदलाव लाना और हर बच्चे को शिक्षा के महत्व को समझाना. बसंती की मेहनत रंग लाई और वर्ष 2005 में उनकी नियुक्ति पारा-टीचर के रूप में सिंदरी के रोड़ाबांध उत्क्रमित मध्य विद्यालय में हुई. पिछले 18 वर्षों से वह इसी विद्यालय में कक्षा 1 से 8 तक के 100 से अधिक बच्चों को शिक्षा दे रही हैं. बसंती पैरों से ब्लैकबोर्ड पर लिखती हैं. कॉपी जांचती हैं. पूरी ईमानदारी और समर्पण के साथ वह अपना दायित्व निभाती हैं. उनकी लगन और कार्यशैली देखकर लोग आज भी प्रेरणा लेते हैं.
20 वर्षों से हैं पारा-टीचर
बसंती कहती हैं कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता. बस जरुरी है ईमानदारी और निष्ठा के साथ उसे पूरा करना. दिव्यांग जनों से मैं कहना चाहती हूं कि किसी भी परिस्थिति में हार न मानें. आपके पास जो भी प्रतिभा है. उसे निखारने का प्रयास करें, तभी सफलता आपके कदम चूमेगी. बसंती का एक महत्वपूर्ण सपना अब भी अधूरा है. 20 वर्षों तक पारा-टीचर की भूमिका निभाने के बाद अब वह सरकारी शिक्षिका बनने की इच्छा रखती हैं. उनका कहना है कि सरकार और जिला प्रशासन यदि उन पर ध्यान दे तो वह भी एक नियमित सरकारी शिक्षिका बनकर समाज और बच्चों के हित में और बेहतर योगदान कर सकती हैं.
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