चुनावी तिलिस्म और संजीव सिंह की प्रचंड जीत
इस चुनाव में संजीव सिंह ने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी और पूर्व मेयर चंद्रशेखर अग्रवाल को 31,902 मतों के भारी अंतर से शिकस्त दी शनिवार देर रात घोषित परिणामों के अनुसार, संजीव सिंह को कुल 1,14,362 वोट मिले. यह धनबाद नगर निगम के इतिहास में पहली बार है जब किसी प्रत्याशी ने एक लाख से अधिक मतों का आंकड़ा पार किया है.
दूसरी ओर, झामुमो समर्थित चंद्रशेखर अग्रवाल को 82,460 वोट मिले, जबकि कांग्रेस के शमशेर आलम 59,079 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे. सबसे चौंकाने वाला प्रदर्शन भाजपा समर्थित प्रत्याशी संजीव कुमार का रहा, जो सांसद और विधायकों की पूरी फौज के प्रचार के बावजूद मात्र 57,895 वोट पाकर चौथे स्थान पर खिसक गए.
एक फैसले से बढ़ा ‘सिंह मेंशन’ का दबदबा
संजीव सिंह का भाजपा से पुराना नाता रहा है और वे इसी पार्टी के टिकट पर विधायक भी रहे. हालांकि, इस बार पार्टी ने उन्हें समर्थन नहीं दिया. जिसके बाद उन्होंने निर्दलीय मैदान में उतरने का साहसिक फैसला लिया. भाजपा ने अपने प्रत्याशी के पक्ष में सांसद ढुलू महतो और धनबाद विधायक राज सिंह सहित पूरी सांगठनिक ताकत झोंक दी थी. इसके बावजूद, संजीव सिंह ने साबित कर दिया कि धनबाद की जनता के बीच उनका व्यक्तिगत प्रभाव किसी भी सिंबल से बड़ा है.
क्यों हो रही है ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ की चर्चा?
संजीव सिंह ‘सिंह मेंशन’ परिवार से आते हैं, जिसकी नींव उनके पिता और मजदूर नेता सूर्यदेव सिंह ने रखी थी. सूर्यदेव सिंह झरिया से कई बार विधायक रहे और धनबाद की राजनीति में दशकों तक उनका एकछत्र राज रहा. बॉलीवुड की मशहूर फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ में रामाधीर सिंह का किरदार काफी हद तक सूर्यदेव सिंह के जीवन और रसूख से प्रेरित बताया जाता है. संजीव की इस जीत ने यह संदेश दिया है कि सिंह मेंशन का दबदबा न केवल झरिया तक सीमित है, बल्कि अब पूरे धनबाद शहर में इसकी धमक बढ़ी है. बता दें कि संजीव सिंह के परिवार का झरिया में विधायकी कायम है. फिलहाल उनकी पत्नी रागिनी सिंह यहां से बीजेपी की विधायक हैं.
संजीव सिंह की जीत के 5 बड़े कारण
संजीव सिंह की जीत कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीतिक जीत मानी जा रही है। इसके पीछे निम्नलिखित पांच मुख्य कारक रहे:
- युवाओं की गोलबंदी: सोशल मीडिया पर संजीव सिंह के पक्ष में एक लहर देखी गई। युवाओं के एक बड़े वर्ग ने न केवल उनके पक्ष में प्रचार किया, बल्कि वोटिंग प्रतिशत बढ़ाकर जीत सुनिश्चित की.
- सहानुभूति लहर: संजीव सिंह करीब 8 साल जेल में रहे. नीरज सिंह हत्याकांड में कोर्ट से बरी होने के बाद जनता के एक बड़े हिस्से में यह संदेश गया कि उन्हें राजनीतिक साजिश के तहत फंसाया गया था.
- भाजपा के कोर वोट बैंक में सेंध: निर्दलीय होने के बावजूद संजीव सिंह ने भाजपा के पारंपरिक वोटों में बड़ी सेंधमारी की. धनबाद और बाघमारा जैसे क्षेत्रों में भी उन्हें अप्रत्याशित समर्थन मिला.
- बाहरी बनाम भीतरीः सांसद ढुलू महतो के आक्रामक बयानों को संजीव समर्थकों ने ‘बाहरी बनाम भीतरी’ का मुद्दा बना दिया, जिससे स्थानीय मतदाताओं का झुकाव संजीव की ओर हुआ.
- विरोधियों की घेराबंदी का उल्टा असर: चुनाव के दौरान सभी बड़े दलों के निशाने पर अकेले संजीव सिंह थे. इस चौतरफा हमले ने मतदाताओं के मन में संजीव को एक ‘अकेले योद्धा’ के रूप में स्थापित कर दिया.
जेल से मेयर की कुर्सी तक का सफर
संजीव सिंह का हालिया इतिहास काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है. उन्हें 2017 में अपने चचेरे भाई और पूर्व डिप्टी मेयर नीरज सिंह सहित चार लोगों की हत्या की साजिश रचने के आरोप में जेल जाना पड़ा था. अप्रैल 2017 से अगस्त 2025 तक वे न्यायिक हिरासत में रहे.
कोर्ट का फैसला: 8 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने खराब स्वास्थ्य के आधार पर उन्हें जमानत दी थी. इसके तुरंत बाद, 27 अगस्त 2025 को धनबाद की विशेष MP-MLA कोर्ट ने साक्ष्यों के अभाव में उन्हें इस मामले से पूरी तरह बरी कर दिया. कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष उनके खिलाफ हत्या की साजिश का कोई भी ठोस सबूत पेश करने में नाकाम रहा। जेल से बाहर आने के ठीक बाद इस बड़ी जीत ने उनके राजनीतिक करियर को नई दिशा दे दी है.
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