महीनों नहीं मिलता काम
झारखंड के सुदूर ग्रामीण इलाकों में रहने वाला तुरी समाज आज गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है. भगवानपुर, चुल्हिया और आसपास के गांवों में रहने वाले सैकड़ों परिवारों की रोज़ी-रोटी इसी पारंपरिक कला पर निर्भर थी. पहले पूरे साल किसी न किसी कार्यक्रम में ढोल बजाने का काम मिल जाता था, लेकिन अब हालात ऐसे हैं कि महीनों तक कोई काम नहीं मिलता. ढोल वादक बसंत तुरी बताते हैं कि पहले शादी-ब्याह का मौसम आते ही घर-घर से बुलावा आता था. उसी कमाई से बच्चों की पढ़ाई, घर का खर्च और त्योहार पूरे होते थे. अब लोग डीजे बजाकर खुशियां मनाने लगे हैं. हमारी थाप सुनने का वक्त किसी के पास नहीं है. कई बार हालात इतने खराब हो जाते हैं कि दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल हो जाता है.
सरकारी कार्यक्रमों में दिखावा, स्थायी सहारा नहीं
विडंबना यह है कि जब कोई बड़ा सरकारी या सांस्कृतिक कार्यक्रम होता है, मुख्यमंत्री, मंत्री या बड़े अधिकारी झारखंड आते हैं, तब मंच की शान बढ़ाने के लिए तुरी समाज को बुलाया जाता है. ढोल-नगाड़ों की गूंज से झारखंड की संस्कृति को दर्शाया जाता है. कैमरे चलते हैं, तस्वीरें खिंचती हैं और तालियां बजती हैं. लेकिन कार्यक्रम खत्म होते ही कलाकार फिर अपने संघर्ष भरे जीवन में लौट जाते हैं. सम्मान तो मिलता है, लेकिन न तो स्थायी रोजगार मिलता है और न ही भविष्य की कोई सुरक्षा.
शिक्षा और गरीबी ने बढ़ाई मुश्किलें
आर्थिक तंगी के साथ-साथ शिक्षा की कमी तुरी समाज की सबसे बड़ी समस्या बन गई है. समाज के बहुत कम लोग पढ़े-लिखे हैं. अधिकतर परिवार सुदूर और जंगली इलाकों में रहते हैं, जहां स्कूल, सड़क और अन्य बुनियादी सुविधाओं का अभाव है. गरीबी के कारण बच्चे पढ़ाई बीच में ही छोड़ देते हैं. जब पेट भरने की चिंता हो, तो शिक्षा सबसे पहले पीछे छूट जाती है. शिक्षा की कमी के कारण तुरी समाज के लोग सरकारी योजनाओं की सही जानकारी भी नहीं जुटा पाते. कला और कलाकारों के लिए बनी कई योजनाएं कागजों तक ही सीमित रह जाती हैं. इसका नतीजा यह है कि यह सदियों पुरानी परंपरा धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही है.
नई पीढ़ी दूर हो रही है अपनी परंपरा से
सबसे बड़ी चिंता अगली पीढ़ी को लेकर है. आज तुरी समाज के युवा ढोल और नगाड़े को अपना भविष्य नहीं मानते. वे मजदूरी, शहरों में छोटे-मोटे काम या अन्य पेशों की ओर रुख कर रहे हैं. उनका साफ कहना है कि इस कला में न तो स्थायी आमदनी है और न ही कोई सुरक्षा. कई घरों में अब ढोल-नगाड़े बजते नहीं, बल्कि सिर्फ यादों के रूप में रखे हुए हैं.
प्रशिक्षण और अवसर मिले तो बदल सकते हैं हालात
चुल्हिया बस्ती के युवाओं का कहना है कि अगर सरकार पारंपरिक वाद्य यंत्रों को आधुनिक तकनीक से जोड़कर प्रशिक्षण दे, तो हालात बदल सकते हैं. उन्हें मंच, सम्मान और नियमित रोजगार मिले, तो वे अपनी कला को छोड़ना नहीं चाहेंगे. इससे न सिर्फ उनकी जिंदगी बेहतर होगी, बल्कि झारखंड की लोकसंस्कृति भी जीवित रहेगी.
तुरी समाज का साफ कहना है कि वे भीख नहीं, बल्कि अपने हुनर की पहचान और अवसर चाहते हैं. उनका आग्रह है कि सरकार शिक्षा की व्यवस्था करे, प्रशिक्षण केंद्र खोले, नियमित कार्यक्रमों में उन्हें शामिल करे और उनकी कला को रोजगार से जोड़े. अगर अब भी इस ओर ध्यान नहीं दिया गया, तो वह दिन दूर नहीं जब झारखंड की पहचान मानी जाने वाली ढोल-नगाड़ों की थाप सिर्फ किताबों और मंचों तक सिमट कर रह जाएगी, और एक पूरा समाज इतिहास के पन्नों में खो जाएगा.
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