मौत के दूत सैलाब को आता देख अरविंद ने अपने बच्चों की जान तो बचा ली, लेकिन अब आगे की जिंदगी गुजारने के लिए उनके सिर पर छत नहीं बची है. दो महीने बाद भी अपने बच्चों के साथ अरविंद सरकारी स्कूल के एक कोने में रहने को मजबूर हैं. उनका एक बेटा विकलांग है. उन्होंने बताया कि उन्हें सरकार की ओर से 5 लाख का मुआवजा मिला है, लेकिन 5 लाख में न ही घर बन पाएगा और न ही वह जमीन ले पाएंगे. उनके सामने बड़ा संकट खड़ा है कि आखिर अपने हैंडीकैप बच्चे को लेकर वह कहां जाएं. सारा सामान पानी में बह गया, उनकी जिंदगी की गाड़ी अब पटरी पर कैसे लौटेगी, वह कैसे इतनी महंगाई में शुरूआत करेंगे, यह चिंता उनके चेहरे पर देखी जा सकती है.
तबाही का वह दिन और आज की लाचार जिंदगी
‘दिहाड़ी मजदूरी कर जोड़ा था सामान, न सिर पर छत बची’, यह चंद शब्द नहीं, बल्कि अरविंद की आंखों में तैरते उस दर्द और लाचारी का प्रतिबिंब है. अरविंद पंवार ने बताया कि वह पिछले 16 सालों से यहां रह रहे थे. उन्होंने राजपुर के इस गांव में दिहाड़ी-मजदूरी से पाई-पाई जोड़कर अपने परिवार के लिए एक छोटा सा आशियाना बनाया था. वह घर, जिसे उन्होंने बच्चों के सिर पर छत देने के लिए तैयार किया था, 16 सितंबर की रात तेज बहाव के सामने टिक नहीं पाया.
घर के साथ-साथ सारा सामान भी पानी में बह गया. अरविंद ने साहस दिखाकर अपने बच्चों की जान तो बचा ली, लेकिन अब आगे की ज़िंदगी गुजारने के लिए उनके पास न तो छत है और न ही काम है. उनके तीन बच्चे हैं जिनमें से एक बच्चा विकलांग है. उनकी पत्नी बीमार है. वह पिछले 3 महीने से स्कूल में रह रहे हैं. अब उन्हें स्कूल भी खाली करना है, लेकिन उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि जाएं तो जाएं कैसे?
मुआवजा मिला, पर दुश्वारियां नहीं हुई कम
मानसून की आपदा को लगभग तीन महीने बीत चुके हैं. शहर में भले ही जन-जीवन सामान्य होने लगा हो, पर अरविंद और उनके परिवार के लिए तबाही का वह मंजर अभी भी खत्म नहीं हुआ है. मजबूरी का आलम यह है कि अरविंद अपने बच्चों के साथ सरकारी स्कूल के एक कोने में रहने को मजबूर हैं. उनकी चिंता तब और बढ़ जाती है जब वह अपने विकलांग बेटे की ओर देखते हैं. उस छोटे से कोने में, एक हैंडीकैप बच्चे के साथ ज़िंदगी गुज़ारना, किसी सजा से कम नहीं है.
अरविंद बताते हैं कि उन्हें सरकार की ओर से 5 लाख रुपये का मुआवजा मिला है, लेकिन इस महंगाई के दौर में 5 लाख की यह राशि न तो उन्हें दोबारा घर बनाने देगी और न ही जमीन खरीदने में मददगार होगी, यहां जमीन खरीदना लाखों की बात है. उनके सामने एक बड़ा संकट खड़ा है: ‘आखिर अपने हैंडीकैप बच्चे को लेकर वह जाएं तो कहां जाएं?’, अरविंद ने दर्द बयां करते हुए कहा कि सारा सामान पानी में बह गया, उनकी ज़िंदगी की गाड़ी अब पटरी पर कैसे लौटेगी, वह कैसे इतनी महंगाई में शुरूआत करेंगे, स्कूल छोड़कर रहने के लिए कहां जाएंगे, यह चिंता उनके चेहरे पर साफ देखी जा सकती है.
जख्मों पर मरहम लगाने के लिए नाकाफी
अरविंद की यह कहानी, आपदा प्रभावित क्षेत्रों में उन हजारों परिवारों के दर्द को बयां करती है, जिनके लिए सरकारी मदद भी जख्मों पर मरहम लगाने के लिए नाकाफी है. एक दिहाड़ी मजदूर के लिए शून्य से फिर शुरुआत करना, जब जमा पूंजी और सहारा सब बह चुका हो, एक पहाड़ तोड़ने जैसा है. अरविंद को केवल घर की नहीं, बल्कि अपने विकलांग बच्चे के भविष्य और सामान्य जीवन की वापसी के लिए एक मजबूत सहारे की जरूरत है.
Discover more from India News
Subscribe to get the latest posts sent to your email.