देहरादून. उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में कड़ाके की ठंड जीवन की सबसे बड़ी चुनौती होती है. ऐसे में यहां के पारंपरिक परिधान केवल पहनावे तक सीमित नहीं रहते, बल्कि जीवन को सुरक्षित रखने का माध्यम बन जाते हैं. ठिठुरती सर्दियों के बीच ‘पाखुला’ भी ऐसा ही एक वस्त्र है, जो सिर्फ कपड़ा नहीं बल्कि पर्वतीय जीवन की उत्तरजीविता, संस्कृति और परंपरा का प्रतीक माना जाता है.
पाखुला केवल एक वेशभूषा नहीं, बल्कि सर्दियों से बचाव का पारंपरिक ऊनी कवच है. राज्य का उत्तरी सीमांत क्षेत्र विषम भौगोलिक परिस्थितियों और तीव्र शीत के लिए जाना जाता है. चमोली जिले के नीति और माणा जैसे उच्च हिमालयी गांवों में, जहां तापमान अक्सर शून्य से नीचे चला जाता है, ऊनी आवरण जनजीवन का अहम हिस्सा हैं. इन्हीं पारंपरिक परिधानों में ‘पाखुला’ सबसे प्रमुख है, जिसे स्थानीय भाषा में पाखुल या पाखला भी कहा जाता है. यह मोटा, कंबलनुमा वस्त्र कड़ाके की ठंड में शरीर को सुरक्षित रखता है.

ऐतिहासिक रूप से पाखुला बनाने की प्रक्रिया अत्यंत मेहनत-तलब रही है. बुजुर्गों के अनुसार पुराने समय में यह सफेद भेड़ की ऊन से तैयार किया जाता था, लेकिन समय के साथ आए बदलावों के कारण अब इसे काली भेड़ की ऊन से भी बनाया जाने लगा है. यह वस्त्र मुख्य रूप से चमोली जनपद की पहचान है, हालांकि इतिहास बताता है कि कभी यह पूरे गढ़वाल क्षेत्र के ग्रामीण अंचलों में महिलाओं का प्रमुख पहनावा था. आज भी यहां की महिलाएं इस पारंपरिक परिधान में दिखाई देती हैं.

पाखुला के निर्माण की पारंपरिक विधि इसकी विशिष्टता को दर्शाती है. पहले इसे बकरी के बालों से भी बनाया जाता था. प्रक्रिया की शुरुआत बकरी के बाल काटने से होती थी, इसके बाद सफेद बालों को सावधानी से अलग कर उनकी कताई की जाती थी. फिर सुतली या पतली रस्सी की मदद से बुनाई कर कपड़ा तैयार किया जाता था. यह हस्तशिल्प का उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसमें पशुपालन और कला का सुंदर संगम दिखाई देता है.
Add News18 as
Preferred Source on Google

इसकी बनावट की जटिलता का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि एक पूरा पाखुला तैयार करने में लगभग दो महीने का समय लगता था. इसे दो अलग-अलग हिस्सों में बुना जाता था और बाद में कुशलता से जोड़कर एक पूर्ण परिधान का रूप दिया जाता था. एक मानक पाखुला बनाने में ढाई से तीन मीटर तक मोटे ऊनी कपड़े का उपयोग होता है, जो इसे सर्दियों के लिए एक मजबूत और प्रभावी कवच बनाता है.

हिमालयी क्षेत्रों में सर्दियों के दौरान उपयोगिता की दृष्टि से पाखुला बेजोड़ है. भारी और वजनदार होने के कारण यह शरीर की गर्मी को भीतर ही बनाए रखता है, जिससे बर्फीली हवाओं का प्रभाव कम हो जाता है. इसी वजह से आज भी जोशीमठ, बद्रीनाथ और माणा क्षेत्र की महिलाएं इसे गर्व के साथ पहनती हैं. अन्य पहाड़ी इलाकों में भी कुछ बुजुर्ग महिलाएं इसे आज भी अपनी पहली पसंद मानती हैं, क्योंकि आधुनिक जैकेटों की तुलना में यह कहीं अधिक गर्माहट देता है.

सांस्कृतिक दृष्टि से पाखुला उत्तराखंड की महिलाओं के स्वावलंबन और उनकी कलात्मक अभिव्यक्ति का प्रतीक रहा है. यह जितना आकर्षक और गरिमामय दिखाई देता है, उतना ही इसे धारण करने वाली महिला के व्यक्तित्व में पारंपरिक निखार जोड़ता है. हालांकि आधुनिकता की दौड़ और बाजार में उपलब्ध हल्के सिंथेटिक वस्त्रों के चलते नई पीढ़ी ने इसके भारीपन के कारण इसे लगभग छोड़ दिया है, जिससे यह विशिष्ट कला धीरे-धीरे सिमटती जा रही है.

वर्तमान समय में पाखुला के स्वरूप में भी परिवर्तन आया है. अब यह बाजारों में मशीन से बने सामान्य कपड़ों के रूप में भी उपलब्ध होने लगा है, जिससे इसकी उपलब्धता तो बढ़ी है, लेकिन इसका पारंपरिक स्पर्श और मजबूती कम हो गई है.
Discover more from India News
Subscribe to get the latest posts sent to your email.