इतिहास के अनुसार, अंग्रेजों ने मसूरी में बड़े पैमाने पर बांज के पेड़ लगाए थे. अंग्रेजी हुकूमत के दौरान लंढौर क्षेत्र में ब्रिटिश सैनिकों के लिए अस्पताल और सेनेटोरियम बनाए गए थे. प्रथम विश्व युद्ध के समय जब सैनिक घायल होते थे, तो उन्हें यहां इलाज के लिए लाया जाता था. सैनिकों की सुरक्षा और कैंट एरिया की गोपनीयता बनाए रखने के लिए ब्रिटिश शासन ने इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर ओक के पेड़ लगाए. लगभग डेढ़ सौ साल पहले ब्रिटेन की महारानी डचेस ऑफ एडिनबर्ग ने भी मसूरी में पौधा रोपण किया था.
देहरादून के डीएवी पीजी कॉलेज की इतिहास विभाग की प्रोफ़ेसर अंजू बाली पांडे के अनुसार, मसूरी का प्राकृतिक परिदृश्य और ऊंचे-ऊंचे पहाड़ पर्यावरण और पर्यटन के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं. उन्होंने बताया कि ब्रिटिश हुकूमत ने इन पेड़ों को सिर्फ सुंदरता के लिए नहीं बल्कि सैन्य और सुरक्षा उद्देश्यों के लिए भी लगाया था. लंढौर क्षेत्र में अस्पताल और छावनी की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ओक के पेड़ लगाए गए थे ताकि क्षेत्र की गोपनीयता बनी रहे.
बांज के पेड़ों का पर्यावरणीय महत्व
मसूरी की प्राकृतिक सुंदरता को और निखारते हैं बांज और चीड़ के पेड़. ये वृक्ष न केवल मसूरी की हरियाली बनाए रखते हैं बल्कि मिट्टी के कटाव को रोकने और जल संरक्षण में भी मदद करते हैं. बांज के पेड़ों की चौड़ी पत्तियां और मोटी डालियां वर्षभर मिट्टी को सुरक्षित रखती हैं और बारिश का पानी जमीन तक सोखती हैं. इससे पहाड़ी क्षेत्रों में जलस्त्रोतों में पानी पर्याप्त मात्रा में रहता है.
आज भी मसूरी के पर्यावरण में अहम है ये पेड़
ब्रिटिश शासन के दौरान मसूरी को एक सुविधाजनक हिल स्टेशन और सैन्य क्षेत्र बनाने के लिए पौधारोपण किया गया. 1827 में आसपास सेनेटोरियम और अस्पताल बनाए गए, जहां घायल सैनिकों का इलाज होता था. सुरक्षा और गोपनीयता के कारण इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर ओक के पेड़ लगाए गए. ये पेड़ आज भी मसूरी के हरियाली और ऐतिहासिक परिदृश्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.
मसूरी में बांज के पेड़ न केवल पर्यटक आकर्षण का केंद्र हैं बल्कि स्थानीय लोगों और वन्य जीवों के लिए भी लाभकारी हैं. ये पेड़ मसूरी को प्राकृतिक सुंदरता, ऐतिहासिक महत्व और पर्यावरण संरक्षण का अद्भुत मिश्रण प्रदान करते हैं.
Discover more from India News
Subscribe to get the latest posts sent to your email.