कांथा वर्क की खासियत
कांथा वर्क पूरी तरह सुई और धागे से हाथों द्वारा तैयार किया जाता है. यही वजह है कि यह कढ़ाई न सिर्फ बेहद खूबसूरत दिखती है, बल्कि काफी मजबूत और टिकाऊ भी होती है. यह कपड़े लंबे समय तक खराब नहीं होते और रोजाना इस्तेमाल और धुलाई के बाद भी सालों तक नए जैसे बने रहते हैं.
500 साल पुरानी है कांथा कढ़ाई की परंपरा
कांथा कढ़ाई को बंगाल की सबसे पुरानी और समृद्ध हस्तकला में से एक माना जाता है. बताया जाता है कि इसका इतिहास करीब 500 साल पुराना है. एक कथा के अनुसार, महात्मा बुद्ध और उनके शिष्यों ने खुद को ढकने के लिए अलग-अलग कपड़ों के टुकड़ों को जोड़कर एक बड़ा कपड़ा बनाया था. वही कपड़ा इतना सुंदर नजर आया कि इसी से कांथा कढ़ाई की शुरुआत मानी जाती है. यह कला मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल में विकसित हुई और आज दुनियाभर में अपनी अलग पहचान बना चुकी है.
खूबसूरत रंगों के धागों से की गई कांथा वर्क की साड़ियां करवा चौथ और अन्य खास मौकों के लिए शानदार विकल्प मानी जाती हैं. ये साड़ियां न सिर्फ पहनने वाली की खूबसूरती बढ़ाती हैं, बल्कि उनके ग्रेस और एलिगेंस में भी चार चांद लगा देती हैं. कांथा वर्क की साड़ी को भारतीय हस्तकला का बेहतरीन नमूना माना जाता है.
कांथा वर्क की खास बातें
पिछले 20 से 25 सालों से कांथा स्टिच पर काम कर रहे अली हसन बताते हैं कि पश्चिम बंगाल की कांथा कढ़ाई दुनियाभर में मशहूर है. यह ज्यादातर सूती कपड़ों पर अलग-अलग तरह के रंगीन धागों से बनाई जाती है. यह कपड़े बहुत आरामदायक होते हैं और लंबे समय तक चलते हैं. अगर इन्हें रोजाना भी धोया जाए, तब भी इनकी मजबूती और सुंदरता बनी रहती है. हस्तकला पसंद करने वाले लोगों के लिए कांथा वर्क का कपड़ा एक बेहतरीन विकल्प है.
साड़ी बनाने में लगते हैं कई महीने
अली हसन बताते हैं कि कांथा वर्क की एक साड़ी तैयार करने में करीब 6 महीने का समय लग जाता है. वहीं अगर कांथा वर्क का दुपट्टा बनाया जाता है, तो उसे तैयार करने में करीब एक महीना लगता है, जिसमें दो कारीगर मिलकर काम करते हैं. यही वजह है कि कांथा साड़ी की कीमत आमतौर पर 15 हजार से 25 हजार रुपये तक होती है. अगर साड़ी पर ज्यादा बारीक और भारी काम किया गया हो, तो इसकी कीमत 50 हजार से 70 हजार रुपये तक भी पहुंच जाती है. कुछ खास डिजाइनों में यह कीमत लाखों रुपये तक भी हो सकती है. दुपट्टों की कीमत 4 से 5 हजार रुपये के बीच रहती है.
कुछ विशेषज्ञ कांथा कढ़ाई को सिंधु घाटी सभ्यता की प्राचीन तकनीक से भी जोड़कर देखते हैं. उस दौर में कपड़ों के छोटे-छोटे टुकड़ों को जोड़कर बड़े कपड़े तैयार किए जाते थे. बंगाल में आज भी कांथा स्टिच से सिर्फ साड़ियां और सूट ही नहीं, बल्कि रजाई और चादरें भी बनाई जाती हैं.
कहां और कैसे खरीद सकते हैं कांथा वर्क के कपड़े
अगर आप पारसी वर्क, फेंच नॉट, कश्मीरी स्टिच और कांथा वर्क के सूट, साड़ियां और बेडशीट खरीदना चाहते हैं, तो देहरादून के बन्नू मैदान में आयोजित इंडिया ग्लोबल ट्रेड फेयर में आ सकते हैं. यहां कपड़ों की कीमत 800 रुपये से शुरू हो जाती है, जिससे हर वर्ग के लोग अपनी पसंद के अनुसार खरीदारी कर सकते हैं.
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