देहरादून और आसपास के क्षेत्र सिर्फ प्राकृतिक सुंदरता के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी ऐतिहासिक वास्तुकला के लिए भी प्रसिद्ध हैं. यहां के पुराने चर्च, जो गॉथिक और विक्टोरियन शैली के अद्भुत उदाहरण हैं, आज भी पर्यटकों और इतिहास प्रेमियों को अपनी ओर खींचते हैं और ब्रिटिश काल की झलक बखूबी पेश करते हैं.
चकराता के खूबसूरत हिल स्टेशन में स्थित यह चर्च, 1870 में निर्मित, वास्तुकला का एक अद्भुत उदाहरण है. इसकी नियो-गोथिक शैली इसकी सबसे बड़ी खासियत है. स्थानीय पत्थरों से बनी दीवारें, नुकीली खिड़कियां और ऊंचे मेहराब इसे एक राजसी रूप देते हैं. आज भी यह चर्च अपनी मूल स्थिति में सुरक्षित है.

देहरादून के राजपुर रोड के पास स्थित यह चर्च 1840 के दशक का है. इसकी क्लासिकल यूरोपियन शैली, लाल ईंटों और चूने के प्लास्टर का सुंदर मिश्रण इसे खास बनाता है. इसकी सादगी और शांत वातावरण ब्रिटिश काल की सैन्य छावनियों के चर्चों की याद दिलाता है.

यह चर्च अमेरिकन प्रेस्बिटेरियन मिशन की ओर से बनाया गया था. इसकी शैली पारंपरिक अंग्रेजी चर्चों से थोड़ी भिन्न है, जिसमें ऊंची छतें और लकड़ी के भारी बीम इस्तेमाल किए गए हैं. पत्थर की दीवारें और चारों ओर फैले पुराने वृक्ष इसे एक ऐतिहासिक आभा प्रदान करते हैं.
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सेंट फ्रांसिस ऑफ असीसी चर्च, देहरादून में एक पुराना और भव्य चर्च है. इसकी वास्तुकला इतालवी पुनर्जागरण से प्रभावित है. चर्च के भीतर की नक्काशी और कांच की पेंटिंग कला उत्कृष्टता का शानदार उदाहरण पेश करती हैं.

1836 में निर्मित यह हिमालय का सबसे पुराना चर्च माना जाता है. इसकी वास्तुकला गॉथिक रिवाइवल शैली की है. चर्च की खिड़कियों पर लगे रंगीन कांच ईसा मसीह के जीवन की घटनाओं को दर्शाते हैं. पुराना पाइप ऑर्गन और आसपास का देवदार का जंगल इसे और भी खूबसूरत बनाते हैं.

सर्दियों की ठंडी हवाओं और देवदार के पेड़ों की खुशबू के बीच, जंगलों में स्थित यह बेहद पुराना चर्च कुदरत और परमात्मा के नज़दीक होने का अद्भुत अहसास देता है. मसूरी के लंढौर कैंट में स्थित यह चर्च 1895 में ब्रिटिश सैनिकों के लिए बनाया गया था. इसकी बनावट में लकड़ी और स्थानीय पत्थरों का मुख्य प्रयोग हुआ है, और ढलवां छतें भारी बर्फबारी को सहने के लिए डिजाइन की गई हैं, जो ब्रिटिश पर्वतीय वास्तुकला की खास पहचान हैं.

सेंट पॉल चर्च, मसूरी के लंढौर क्षेत्र में स्थित एक ऐतिहासिक एंग्लिकन चर्च है. इसका निर्माण 1839 में हुआ था और कलकत्ता के बिशप डैनियल विल्सन ने 1 मई 1840 को इसका पहला अभिषेक किया. यहां आने वाले लोग सिर्फ चर्च की वास्तुकला ही नहीं, बल्कि आसपास की चार दुकानों और सिस्टर बाजार जैसी छोटी पर आकर्षक जगहों का भी आनंद ले सकते हैं.
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