एंजेल चकमा त्रिपुरा से देहरादून पढ़ाई के सपने लेकर आया था. परिवार ने उम्मीदों के साथ उसे विदा किया था कि वह सुरक्षित माहौल में शिक्षा हासिल करेगा और अपने भविष्य को बेहतर बनाएगा. लेकिन कथित रूप से नस्लीय टिप्पणी के बाद हुए हमले और फिर अस्पताल में संघर्ष करते हुए उसकी मौत ने इन उम्मीदों को तोड़ दिया. इस खबर ने न सिर्फ उसके परिवार को गहरे सदमे में डाल दिया, बल्कि देहरादून में रह रहे पूर्वोत्तर भारत के छात्रों को भी मानसिक रूप से झकझोर दिया है.
छात्रों का सवाल- क्या हम यहां सुरक्षित हैं?
एंजेल की मौत के बाद देहरादून की सड़कों पर पूर्वोत्तर के छात्रों का आक्रोश साफ दिखाई दिया. बड़ी संख्या में छात्र सड़कों पर उतरे, हाथों में पोस्टर थे और आंखों में आंसू. इस विरोध प्रदर्शन में स्थानीय दूनवासी भी छात्रों के साथ खड़े नजर आए. यह प्रदर्शन सिर्फ एंजेल के लिए न्याय की मांग नहीं था, बल्कि यह उस असुरक्षा की आवाज थी, जो वर्षों से दबे स्वर में मौजूद थी.
छात्रों का कहना है कि अक्सर उनकी शारीरिक बनावट, रहन-सहन और संस्कृति को लेकर कटाक्ष किए जाते हैं. आप किस देश से हो?, आपकी करेंसी क्या है? जैसे सवाल और अपमानजनक शब्द कई छात्रों के लिए रोजमर्रा की सच्चाई बन चुके हैं. एक पूर्वोत्तर छात्रा ने बताया कि देहरादून की शिक्षा व्यवस्था अच्छी होने के कारण वह यहां पढ़ने आई थी, लेकिन अब डर लगता है कि अगर पढ़ाई के दौरान ही जान का खतरा हो, तो भविष्य क्या होगा?
डर के साए में सपने बुनने को हुए मजबूर
यूनिफाइड त्रिपुरा स्टूडेंट्स एसोसिएशन से जुड़ी रिशा ने कहा कि हम यहां पढ़ने आते हैं, सपने बुनने आते हैं. हमने कभी नहीं सोचा था कि हमें अपनी सुरक्षा को लेकर डर लगेगा. उन्होंने बताया कि पहले नस्लीय टिप्पणियों को नजरअंदाज कर दिया जाता था, लेकिन एंजेल के साथ हुई घटना ने साबित कर दिया कि यह सिर्फ शब्दों तक सीमित नहीं है. रिशा का कहना है कि अगर ऐसी घटनाएं होती रहीं तो भविष्य में न तो छात्र यहां पढ़ने आना चाहेंगे और न ही माता-पिता अपने बच्चों को देहरादून भेजने का साहस करेंगे. हम सभी भारतीय हैं, फिर भी अगर हमें अलग समझा जाए, तो यह बेहद दुखद है.
कानून और हेल्पलाइन की तेज हुई मांग
देहरादून नॉर्थईस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष ऋषिकेश बरुआ ने इस घटना को बेहद दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि 9 दिसंबर को एंजेल चकमा पर हमला हुआ और इलाज के दौरान 26 दिसंबर को उसकी मौत हो गई. इसके बाद से पूर्वोत्तर समुदाय न्याय की मांग कर रहा है. बरुआ ने सवाल उठाया कि जब देहरादून के बड़े-बड़े शिक्षण संस्थान पूर्वोत्तर राज्यों में जाकर यहां की पढ़ाई का प्रचार करते हैं, तो छात्रों के यहां पहुंचने के बाद उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन लेगा?
उनके अनुसार, देहरादून में पढ़ने वाले कुल छात्रों में लगभग 40 से 50 प्रतिशत बाहर के राज्यों से आते हैं, जिनमें करीब 30 प्रतिशत छात्र पूर्वोत्तर भारत से हैं. उन्होंने मांग की कि दिल्ली पुलिस की तर्ज पर उत्तराखंड में भी नॉर्थईस्ट स्टूडेंट्स के लिए अलग हेल्पलाइन नंबर शुरू किया जाए और छात्रों की सुरक्षा के लिए सख्त कानून बनाया जाए, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो.
देश-विदेश के छात्रों के लिए शिक्षा का अहम केंद्र है देहरादून
देहरादून लंबे समय से न सिर्फ राष्ट्रीय बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी शिक्षा का केंद्र रहा है. यहां दर्जनों सरकारी और निजी विश्वविद्यालय, सैकड़ों प्रोफेशनल कॉलेज हैं, जहां इंजीनियरिंग, मेडिकल, पैरामेडिकल, मैनेजमेंट और अन्य कोर्स कराए जाते हैं. ग्राफिक एरा, यूपीईएस, उत्तरांचल यूनिवर्सिटी, दून स्कूल जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों ने शहर को वैश्विक पहचान दिलाई है. उत्तर प्रदेश, दिल्ली, बिहार, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश के अलावा नेपाल, भूटान और अफ्रीकी देशों से भी छात्र यहां पढ़ाई के लिए आते हैं. पूर्वोत्तर भारत से असम, मणिपुर, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश और मिजोरम के हजारों छात्र देहरादून में शिक्षा हासिल कर रहे हैं.
जानकारों का मानना है कि अगर सरकार ने जल्द ही छात्रों के लिए विशेष सुरक्षा प्रोटोकॉल और भरोसेमंद व्यवस्था नहीं बनाई, तो देहरादून की “सुरक्षित शहर” की छवि को गहरा नुकसान पहुंच सकता है. इसका असर न सिर्फ शिक्षण संस्थानों पर पड़ेगा, बल्कि किराए के मकान, टिफिन सर्विस, परिवहन और स्थानीय व्यापार भी प्रभावित होंगे.
मुख्यमंत्री का आश्वासन, पुलिस की जांच जारी
मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने छात्रों को आश्वस्त किया है कि उत्तराखंड सभी के लिए सुरक्षित है और किसी भी छात्र को डरने की जरूरत नहीं है. सरकार हर हाल में न्याय दिलाएगी और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी.
वहीं, एसएसपी देहरादून अजय सिंह ने कहा कि अभी तक जांच में ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं मिला है, जिससे इस मामले को सीधे तौर पर नस्लीय टिप्पणी से जोड़ा जा सके. हालांकि पुलिस हर पहलू से जांच कर रही है. इस मामले में अब तक पांच आरोपियों की गिरफ्तारी हो चुकी है, जिनमें से दो नाबालिगों को जुवेनाइल शेल्टर होम भेजा गया है, जबकि नेपाल मूल के फरार आरोपी की तलाश जारी है.
इसके साथ ही राष्ट्रीय अनुसूचित जाति जनजाति आयोग और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी इस मामले में सरकार से रिपोर्ट तलब की है.
रैगिंग या उत्पीड़न हो तो कहां करें शिकायत?
यूजीसी द्वारा जारी एंटी रैगिंग हेल्पलाइन नंबर 1800-180-5522 पर किसी भी प्रकार की रैगिंग या उत्पीड़न की शिकायत की जा सकती है. इसके अलावा आपात स्थिति में 112 पर पुलिस सहायता ली जा सकती है. छात्र मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 1905 पर भी अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं, जहां से मामलों की निगरानी सीधे की जाती है.
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