3 मार्च 2026 को चंद्र ग्रहण लग रहा है लेकिन दतिया की पीतांबरा पीठ पर पट खुले रहेंगे. आचार्य विष्णु कांत मुड़िया के अनुसार तांत्रिक पीठ होने से ग्रहण का असर नहीं पड़ता. ग्रहण काल में ऊर्जा बढ़ती है और साधना अधिक फलदायी होती है. श्रद्धालु सुबह से दर्शन कर रहे हैं. यह परंपरा दिव्य शक्ति का प्रमाण है जहां सूतक बेअसर है.
दतिया स्थित विश्व विख्यात मंदिर में सूतक का असर नहीं होता.
पीठ के प्रमुख आचार्य पं. विष्णु कांत मुड़िया ने स्पष्ट किया कि पीतांबरा पीठ एक तांत्रिक शक्ति साधना स्थल है. उनके अनुसार यहां विराजित माँ बगलामुखी की दिव्य शक्ति पर सूर्य या चंद्र ग्रहण का कोई प्रभाव नहीं पड़ता. उन्होंने कहा कि सामान्य मंदिरों में बाल स्वरूप देवताओं की स्थापना होती है, इसलिए ग्रहण काल में पट बंद करने की परंपरा निभाई जाती है. आचार्य का कहना है कि तांत्रिक परंपरा में ग्रहण को विशेष साधना का समय माना गया है. इस दौरान साधना का फल कई गुना अधिक प्राप्त होता है. इसी कारण दूर-दूर से साधक ग्रहण काल में पीठ पर पहुंचते हैं और विशेष जप, अनुष्ठान तथा साधना करते हैं.
ग्रहण का समय और परंपराएं
धार्मिक पंचांग के अनुसार 3 मार्च 2026 को चंद्र ग्रहण दोपहर 3:20 बजे से शुरू होकर शाम 6:46 बजे तक रहेगा. भारत में चंद्रमा उदय के समय ग्रहण का अंतिम चरण ग्रस्तोदित रूप में दिखाई देगा. सामान्यत: सूतक काल ग्रहण से पहले शुरू हो जाता है और इस दौरान मंदिरों के पट बंद रखने की परंपरा है. हालांकि पीतांबरा पीठ में इस व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं किया गया है. मंदिर प्रबंधन के अनुसार आरती, पूजन और दर्शन की प्रक्रिया पूर्ववत जारी रहेगी. श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की रोक-टोक नहीं है.
मां बगलामुखी की महिमा
पीतांबरा पीठ माँ बगलामुखी को समर्पित है, जिन्हें दस महाविद्याओं में से एक माना जाता है. धार्मिक मान्यता है कि माँ बगलामुखी शत्रु नाश, वाक् सिद्धि और सुरक्षा प्रदान करती हैं. देश के विभिन्न हिस्सों से साधक यहां विशेष अनुष्ठान कराने आते हैं. पीठ की पहचान तांत्रिक साधना केंद्र के रूप में भी है. यहां ग्रहण काल में विशेष साधना करने की परंपरा वर्षों से चली आ रही है. समर्थक इसे आस्था और शक्ति का प्रतीक बताते हैं, जबकि कुछ लोग इसे विशिष्ट परंपरा से जोड़कर देखते हैं.
श्रद्धालुओं की बढ़ती भीड़
ग्रहण को लेकर उत्सुकता के बीच आज सुबह से ही मंदिर परिसर में भक्तों की आवाजाही बढ़ गई है. कई श्रद्धालु सूतक काल में भी दर्शन करने पहुंचे. साधकों का कहना है कि ग्रहण काल में साधना करने से विशेष सिद्धि प्राप्त होती है. मंदिर प्रशासन ने व्यवस्था बनाए रखने के लिए अतिरिक्त प्रबंध किए हैं. भीड़ नियंत्रण और सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है. आरती और पूजन निर्धारित समय पर ही हो रहे हैं.
आस्था और परंपरा का संगम
जहां एक ओर ग्रहण को लेकर आम लोगों में सावधानी और परंपरागत नियमों का पालन देखने को मिलता है, वहीं पीतांबरा पीठ की परंपरा अलग संदेश देती है. यहां भय या निषेध नहीं, बल्कि साधना और शक्ति का महत्व बताया जाता है. ग्रहण के दौरान मंदिर के पट खुले रहने की यह परंपरा वर्षों से जारी है. श्रद्धालु इसे मां की कृपा और पीठ की दिव्य ऊर्जा से जोड़ते हैं. 3 मार्च के इस चंद्र ग्रहण में भी पीतांबरा माई के दरबार में दर्शन और साधना निरंतर जारी रही.
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सुमित वर्मा, News18 में 4 सालों से एसोसिएट एडीटर पद पर कार्यरत हैं. बीते 3 दशकों से सक्रिय पत्रकारिता में अपनी अलग पहचान रखते हैं. देश के नामचीन मीडिया संस्थानों में सजग जिम्मेदार पदों पर काम करने का अनुभव. प…और पढ़ें
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