भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के वरिष्ठ नेता कांति गांगुली ने पश्चिम बंगाल में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर बड़ा दावा किया है। उन्होंने कहा है कि मतदान सूची के एसआईआर से सबसे अधिक वे हिंदू प्रभावित होंगे, जो बांग्लादेश से भागकर पश्चिम बंगाल में बस गए हैं।
पूर्व मंत्री कांति गांगुली जिन्हें राज्य में मतदाता सूची के चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के संबंध में सुनवाई के लिए शुक्रवार को निर्वाचन आयोग ने तलब किया है। शुक्रवार को उन्हें दस्तावेज सत्यापन की सुनवाई के लिए बुलाया गया है। इससे पहले उन्होंने गुरुवार को कहा कि वह इस प्रक्रिया के पक्ष में हैं, लेकिन इसे सिर्फ दो-तीन महीनों के बजाय अधिक समय तक चलाया जाना चाहिए था।
‘मैं एसआईआर के पक्ष में हूं, लेकिन…’
वाम मोर्चा के शासनकाल के दौरान एक दशक तक राज्य मंत्रिमंडल में शामिल रह चुके 82 वर्षीय गांगुली ने मीडिया से बात करते हुए कहा, “मैं एसआईआर के पक्ष में हूं, लेकिन यह एक बहुत बड़ा और काफी चुनौतीपूर्ण काम है। इसे ज्यादा सटीक और भरोसेमंद बनाने के लिए अधिक समय दिया जाना चाहिए था। भारत एक बहुत बड़ा देश है जिसकी आबादी बहुत ज्यादा है, इसलिए चुनावी लिस्ट के बेहतर रिवीजन के लिए, अधिक समय दिया जाना चाहिए था।”
‘बांग्लादेशी हिंदू सबसे ज्यादा प्रभावित’
मालूम हो कि कांति गांगुली ने 2001 से 2011 तक सुंदरबन विकास विभाग के मंत्री के रूप में काम किया है, और फिर 2009 से 2011 तक कुछ समय के लिए खेल और युवा कल्याण मंत्री भी रहे हैं। उन्होंने दावा किया, “मैं सुंदरबन इलाके से हूं। यहां बांग्लादेश से आई हिंदुओं की एक बड़ी आबादी रहती है। इस प्रक्रिया में वे सबसे अधिक प्रभावित होंगे।” गांगुली ने कहा कि चुनाव आयोग को इस प्रक्रिया के लिए सही गाइडलाइंस बनानी चाहिए थीं, ताकि वोटर भ्रमित न हों और “गलत अटकलें और बेबुनियाद बातें” बड़े पैमाने पर न फैलाई जाएं।
उन्होंने कहा, “ईसी को बेहतर तैयारी करनी चाहिए थी और एसआईआर के लिए विस्तृत गाइडलाइंस बनानी चाहिए थीं। इससे आम वोटरों के बीच इस प्रक्रिया के बारे में अलग-अलग गलत अटकलों को रोका जा सकता था।” उन्होंने कहा, “एसआईआर से मजबूत संगठनात्मक ढांचे वाली राजनीतिक पार्टियों को फायदा होगा। इससे आने वाले विधानसभा चुनावों में फर्क पड़ेगा। लेकिन मुझे नहीं लगता कि कम्युनिस्टों को इससे फायदा होगा। उन्होंने यह भी माना कि जब तक वाम दल जनता का भरोसा दोबारा हासिल नहीं करते, तब तक चुनावी प्रदर्शन में सुधार नहीं होगा।
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