राजनीतिक गलियारों की खबरों पर भरोसा किया जाए तो 2026 में मुख्यमंत्री धुआंधार पारी खेलने वाले हैं। नए साल की शुरुआत से ही कई बदलाव देखने को मिल सकते हैं। इनमें मंत्रिमंडल विस्तार से लेकर ब्यूरोक्रेसी की नए सिरे से जमावट शामिल है। इसके लिए अंदर ही अंदर मंत्रियों, विधायकों और मंत्रालय से लेकर जिला स्तर तक के अधिकारियों के रिकॉर्ड और कार्यों की छानबीन की जा रही है। गुजरात की तर्ज पर नया मंत्रिमंडल मध्य प्रदेश में अगले साल की शुरुआत में आकार ले सकता है। निगम, मंडल और प्राधिकरणों की नियुक्ति के आदेश तो कार्यकर्ताओं को उनके दो वर्ष पूर्ण होने की सौगात के रूप में अब कभी भी मिल सकते हैं।
हेमंत खंडेलवाल ने की अलग पहचान बनाने की कोशिश
प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल द्वारा हाल ही में किए गए कुछ कार्यों से प्रदेश की राजनीति में उनकी अलग पहचान बनती जा रही है। कुछ लोग इसे ठाकरे युग की याद भी बता रहे हैं। यह पहली बार हो रहा है जब भारतीय जनता पार्टी के भोपाल स्थित मुख्यालय में अब प्रतिदिन दो मंत्री बैठकर कार्यकर्ताओं से मिल रहे हैं और उनकी समस्याओं का मौके पर ही समाधान किया जा रहा है। सागर जिले में पार्टी के दो बड़े नेताओं के बीच पिछले कई साल से चली आ रही अदावत को जिस तरह से खंडेलवाल ने समाप्त करवाया है, उसको लेकर भी उनकी सराहना की जा रही है।
सहकारिता में यह चीता कैसे घुस आया
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव इन दिनों विभिन्न विभागों के कार्यों और गतिविधियों की समीक्षा कर रहे हैं। इसी दौरान वे जब सहकारिता विभाग की समीक्षा कर रहे थे तो उन्हें बताया गया कि बीज विक्रय हेतु एमपी चीता ब्रांड का पंजीयन किया जा रहा है। इस पर मुख्यमंत्री ने चुटकी लेते हुए कहा कि सहकारिता में यह फॉरेस्ट कैसे घुस आया। दरअसल, वर्ष 2025-26 में गेहूं और चना के प्रमाणित बीज का विक्रय एमपी चीता ब्रांड के नाम से किया जा रहा है। यह नाम किसने और क्यों दिया, इसका खुलासा नहीं हो पाया है!
चुनौती बना दुष्कर्म और धर्मांतरण का मामला
प्रदेश के आदिवासी बहुल आलीराजपुर जिले के जोबट में आदिवासी युवतियों के साथ दुष्कर्म और धर्मांतरण के दबाव का मामला अभूतपूर्व तनाव की स्थिति बना चुका है। तीन मुस्लिम आरोपियों पर पॉक्सो, एससी-एसटी, दुष्कर्म और धर्मांतरण की गंभीर धाराएं लगाकर उन्हें जेल भेज दिया गया है, पर जनजाति समाज और हिंदू समुदाय का आक्रोश थम नहीं रहा। अब मांग सीधे बुलडोजर कार्रवाई की है, जिससे प्रशासन के सामने संवैधानिक मर्यादा और जनभावना दोनों की दोहरी चुनौती खड़ी हो गई है। भाजपा की जिलाध्यक्ष तक इस मामले में सक्रिय हैं। चरणबद्ध आंदोलन की चेतावनी से प्रशासन चौतरफा दबाव है। सुप्रीम कोर्ट के मानदंड और उफनती जनता— इन दोनों के बीच संतुलन साधना ही इस समय प्रशासन के लिए सबसे कठिन परीक्षा बन गया है।
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