छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के जस्टिस संजय एस अग्रवाल ने टोनही प्रताड़ना के केस में अहम फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने सत्र न्यायालय के आरोपियों को बरी करने के फैसले को सही ठहराते हुए पीड़ित महिला की अपील खारिज कर दी है। कोर्ट ने अपने फैसले में टिप्पणी करते हुए कहा कि शिकायत दर्ज करने में देरी, गवाहों के बयानों में विरोधाभास और जमीन विवाद की पृष्ठभूमि के कारण केस संदेहास्पद हो गया है। किसी भी प्रकरण में एफआईआर में देरी पर स्पष्ट कारण होना जरूरी है। दरअसल, बलरामपुर-रामानुजगंज जिले के शंकरगढ़ थाना क्षेत्र की महिला ने 26 अगस्त 2012 को शिकायत दर्ज कराई थी। जिसमें उसने आरोप लगाया गया था कि 8 अगस्त 2012 की सुबह करीब 11 बजे रामलाल यादव अपनी पत्नी फूलकुमारी के साथ उसके घर आए और उसे टोनही कहकर (जादू-टोना करने वाली) बताते हुए गाली-गलौज की और जान से मारने की धमकी दी। महिला की इस शिकायत के आधार पर पुलिस ने दोनों आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 294, 506 भाग-2 तथा छत्तीसगढ़ टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम, 2005 की धारा 4 और 5 के तहत केस दर्ज कर लिया। ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी सजा, सत्र न्यायालय ने पलटा आदेश
पुलिस ने इस मामले की जांच और आरोपियों की गिरपतारी के बाद कोर्ट में चालान पेश किया। ट्रायल में गवाहों के बयान और तथ्यों को सुनने के बाद राजपुर के प्रथम श्रेणी न्यायिक ने 28 मार्च 2019 को रामलाल यादव को धारा 506 भाग-2 आईपीसी और टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम की धाराओं के तहत दोषी ठहराया था, जबकि उसकी पत्नी फूलकुमारी को टोनही प्रताड़ना अधिनियम की धाराओं के तहत दोषी माना था। आरोपियों ने इस फैसले को सत्र न्यायालय में चुनौती दी। सत्र न्यायालय बलरामपुर (रामानुजगंज) ने 14 सितंबर 2021 को ट्रायल कोर्ट का फैसला पलटते हुए दोनों आरोपियों को बरी कर दिया। पीड़ित महिला ने हाईकोर्ट में की अपील
सत्र न्यायालय के इस फैसले के खिलाफ शिकायतकर्ता महिला ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 372 के तहत हाईकोर्ट में अपील की। इसमें कहा गया कि ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों के आधार पर सही फैसला दिया था। लेकिन, सत्र न्यायालय ने गवाहों के बयानों का सही मूल्यांकन नहीं किया। जिसके चलते आरोपियों को इसका लाभ मिल गया। हाईकोर्ट ने सत्र न्यायालय के फैसले पर लगाई मुहर
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए पाया कि कथित घटना 8 अगस्त 2012 को हुई थी। लेकिन, शिकायत 26 अगस्त 2012 को दर्ज कराई गई। शिकायत और एफआईआर में इतनी देरी क्यों हुई, इसका कोई संतोषजनक कारण नहीं बताया गया। कोर्ट यह भी पाया कि शिकायतकर्ता और उसके पति के बयानों में कई महत्वपूर्ण विरोधाभास हैं। शिकायतकर्ता ने कहा कि वह 13 अगस्त 2012 को पुलिस अधीक्षक कार्यालय गई थी, जबकि उसके बयान के एक अन्य हिस्से में उसने इस बात से इनकार किया। दूसरी ओर उसके पति ने कहा कि वे दोनों उस दिन एसपी कार्यालय गए थे, लेकिन इसका कोई दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत नहीं दिया गया। इसके अलावा, गवाहों के बयानों से यह भी सामने आया कि शिकायतकर्ता के पति और आरोपी रामलाल यादव के बीच पहले से जमीन का विवाद चल रहा था। इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि सत्र न्यायालय द्वारा आरोपियों को बरी करने के निर्णय उचित है और उसमें हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं बनता।
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