लोकल 18 से बातचीत के दौरान स्वर्गीय पंडित रामयत्न ओझा के चौथी पीढ़ी के परपोता अजय कुमार ओझा ने बताया कि स्वर्गीय पंडित रामयत्न ओझा 8 वर्ष की अवस्था में चना-चबेना बांधकर बनारस गुरुकुल में शिक्षा ग्रहण के लिए साधु संतों के जमात में शामिल हो गए. उन्होंने अपना घर छोड़ दिया. 12 वर्षों तक घर छोड़कर शिक्षा ग्रहण किया. बाद में वह बहुत बड़े ज्योतिषी हो गए. उस समय उत्तर भारत में उनके टक्कर का कोई ज्योतिषी नहीं था.
काशी हिंदू विश्वविद्यालय के ज्योतिष विभाग के विभागाध्यक्ष रहे स्वर्गीय पंडित रामयत्न ओझा शिक्षा ग्रहण करने के लिए महज 8 वर्ष की उम्र में ही अपने घर को त्याग दिए थे. बनारस जाकर अपने गुरु अयोध्या नाथ मिश्रा के पास 12 वर्षों तक उन्होंने शिक्षा ग्रहण किया. उस समय गुरुकुल हुआ करता था. गुरुकुल में ही रहकर पंडित जी ने शिक्षा ग्रहण किया और बहुत बड़े विद्वान होकर उभरे. उन्होंने पंचांग भी लिखा और इसके साथ ही कई ग्रंथ भी लिखे.
विश्व हिंदू पंचांग में क्या है खासियत
हिंदू धर्म में पंचांग का उपयोग शुभ-अशुभ का मुहूर्त देखने, योग नक्षत्र वार और करण की जानकारी के लिए किया जाता है. जन्म कुंडली, व्रत, त्यौहार और गृह प्रवेश सहित अन्य शुभ कार्यों के लिए पंचांग का सहयोग लिया जाता है. सही मायने में यह किताब समय के मार्गदर्शक के रूप में काम करती है. हिंदू धर्म के मानने वाले लोग इसी पंचांग के सहयोग से अपने कार्यों का मुहूर्त और तारीख आदि तय करते हैं.
लोकल 18 से बातचीत के दौरान स्वर्गीय पंडित रामयत्न ओझा के चौथी पीढ़ी के परपोता अजय कुमार ओझा ने बताया कि स्वर्गीय पंडित रामयत्न ओझा 8 वर्ष की अवस्था में चना-चबेना बांधकर बनारस गुरुकुल में शिक्षा ग्रहण के लिए साधु संतों के जमात में शामिल हो गए. उन्होंने अपना घर छोड़ दिया. 12 वर्षों तक घर छोड़कर शिक्षा ग्रहण किया. बाद में वह बहुत बड़े ज्योतिषी हो गए. उस समय उत्तर भारत में उनके टक्कर का कोई ज्योतिषी नहीं था.
उनके परपोते ने बताया कि राजवाड़े के समय बीकानेर स्टेट सहित कई राजवाड़े के वह राजगुरु हुआ करते थे. रणवीर पाठशाला में भी पढ़ाते थे. उन्होंने बताया कि विश्व हिंदू पंचांग उन्हीं की देन थी. उन्होंने बताया कि पंडित रामयत्न मालवीय के मित्र भी थे. उनके साथ मिलकर उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय का स्थापना में भी सहयोग किया. मालवीय जी ने पंडित रामयत्न को ज्योतिषी विभाग में विभाग अध्यक्ष बनाया. उसके बाद पंडित रामयत्न जी से अपना पंचांग दान करने के लिए कहा गया तो स्वर्गीय रामयत्न ओझा ने पंचांग निशुल्क दान कर दिया.
पंडित रामयत्न के परपोते ने कहा कि उन्हें अपने पूर्वजों पर गर्व है. इसके साथ ही उन्होंने अपना एक दुख भी व्यक्त किया कि जिन्होंने हिंदू समाज के लिए इतना किया है उनकी एक प्रतिमा या छपरा में उनके नाम का एक गेट तक नहीं है. उन्होंने कहा कि इस बात का उन्हें दुख है. उन्होंने स्थानीय जनप्रतिनिधि और सरकार से मांग भी रखी कि ऐसे विद्वान व्यक्ति को याद करते हुए उनकी प्रतिमा लगवाने के साथ-साथ गेट और अस्पताल उनके नाम के होने चाहिए ताकि लोग उन्हें याद करते रहें. उन्होंने पूरे जीवन समाज के लिए काम किया है. उन्हें याद करना चाहिए.
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