केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और इस मामले के अन्य आरोपियों को उत्पाद शुल्क नीति मामले में विशेष अदालत द्वारा बरी किए जाने के फैसले को चुनौती देते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। सीबीआई का तर्क है कि विशेष अदालत का यह आदेश अभियोजन पक्ष के मामले के चुनिंदा पठन पर आधारित है, जिसमें आरोपियों की संलिप्तता दर्शाने वाली सामग्री को नजरअंदाज किया गया है और यह स्पष्ट रूप से अवैध है।
सीबीआई ने अपने 974 पृष्ठों के याचिका में कहा है कि विशेष न्यायाधीश ने प्रभावी रूप से एक ‘मिनी-ट्रायल’ किया, जिसमें षड्यंत्र के विभिन्न पहलुओं को अलग-अलग परखा गया, बजाय इसके कि आरोपियों के कार्यों का समग्रता से मूल्यांकन किया जाए। एजेंसी ने इस आदेश को मनमाना बताते हुए कहा कि यह स्पष्ट त्रुटियों से ग्रस्त है, तथ्यों की गलत व्याख्या पर आधारित है और उस चरण के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय के बयानों का उल्लंघन करता है जब आरोप तय किए जाने होते हैं।
गौरतलब है कि विशेष न्यायाधीश जितेंद्र सिंह ने शुक्रवार को उत्पाद शुल्क नीति मामले में केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और 21 अन्य को सीबीआई की आरोप-पत्र पर संज्ञान लेने से इनकार करते हुए बरी कर दिया था। इन 21 लोगों में तेलंगाना जागृति की अध्यक्ष के. कविता भी शामिल हैं। न्यायाधीश ने जांच में खामियों के लिए सीबीआई को फटकार लगाई थी और कहा था कि केजरीवाल के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं है और सिसोदिया व अन्य आरोपियों के खिलाफ प्रथम दृष्टया कोई मामला नहीं बनता है।
कुछ ही घंटों के भीतर, सीबीआई ने एक तत्काल पुनरीक्षण याचिका के माध्यम से उच्च न्यायालय में इस आदेश को चुनौती दी। मामले की सुनवाई नौ मार्च को होनी है। सीबीआई ने अपनी याचिका में कहा है, आक्षेपित आदेश स्पष्ट रूप से अवैध, मनमाना है और इसमें स्पष्ट त्रुटियां हैं। न केवल यह मामले के तथ्यों को सही परिप्रेक्ष्य में समझने में विफल रहा है, बल्कि विशेष न्यायाधीश की यह विफलता जांच एजेंसी और जांच अधिकारी के खिलाफ अनुचित और समझ से बाहर की प्रतिकूल टिप्पणियां करने का कारण बनी है।
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