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Samastipur Bhirha village Holi: समस्तीपुर जिले का भीरहा गांव अपनी 300 साल पुरानी ब्रज शैली की होली के लिए एक बार फिर चर्चा में है. वृंदावन की तर्ज पर आयोजित होने वाले इस ऐतिहासिक उत्सव में इस वर्ष 50 लाख का बजट, आधुनिक रंग हौज और भव्य संध्या आरती मुख्य आकर्षण होंगे. यहां की सबसे बड़ी विशेषता फगुआ पोखर है. जिसका पानी हजारों श्रद्धालुओं के रंग-गुलाल से पूरी तरह गुलाबी हो जाता है.
वृंदावन से भीरहा तक का सफर
जिला मुख्यालय से लगभग 40 किलोमीटर दूर रोसड़ा प्रखंड में स्थित भीरहा गांव की होली का इतिहास अत्यंत रोचक है. बुजुर्गों के अनुसार करीब 250-300 वर्ष पूर्व गांव के पूर्वज वृंदावन गए थे. जहां वे ब्रज की होली से मंत्रमुग्ध हो गए. वहीं से प्रेरित होकर उन्होंने अपने गांव में इस अनूठी परंपरा की नींव रखी. हस्तलिखित दस्तावेजों और स्मृतियों के अनुसार वर्ष 1935 में कुछ ग्रामीण पुनः वृंदावन से लौटे और 1936 से इस आयोजन को एक भव्य संगठित रूप दिया गया. राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने भी कभी इस गांव की होली की विशिष्टता की चर्चा की थी. इस वर्ष का आयोजन उसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को केंद्र में रखकर किया जा रहा है ताकि नई पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक जड़ों और गौरवशाली अतीत से जुड़ सके.
50 लाख का बजट और आधुनिकता का तड़का
इस वर्ष भीरहा की होली पहले से कहीं अधिक भव्य और हाई-टेक होने वाली है. स्थानीय निवासी गोविंद कुमार राय के अनुसार इस बार का बजट लगभग 40 से 50 लाख रुपये तक पहुंचने का अनुमान है. उत्सव की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं. युवाओं के उत्साह को देखते हुए इस बार दो रातों तक विशेष डीजे नाइट और प्रतियोगिताओं का आयोजन होगा. इसमें जबलपुर के प्रसिद्ध राजकुमार बैंड और पटना की नामी बैंड पार्टियों को आमंत्रित किया जा रहा है. पहली बार गांव में रंग हौज की विशेष व्यवस्था की जा रही है. आधुनिक मोटर पंपों और यांत्रिक उपकरणों के जरिए हवा में रंगों की ऐसी फुहार छोड़ी जाएगी कि पूरा वातावरण सतरंगी हो उठेगा. ब्रज की तर्ज पर भव्य संध्या आरती का आयोजन प्रस्तावित है, जो उत्सव में आध्यात्मिक और सांस्कृतिक गरिमा जोड़ देगा.
एकता और अनुशासन की अनूठी मिसाल
भीरहा की होली की सबसे बड़ी खूबसूरती इसकी सामाजिक समरसता है. यहां रंगों के साथ रिश्तों की गर्माहट घुली होती है. उत्सव के दौरान धर्म, जाति या वर्ग की दीवारें ढह जाती हैं. पूरा गांव एक परिवार बन जाता है. होलिका दहन की रात से ही सांस्कृतिक कार्यक्रमों का सिलसिला शुरू हो जाएगा, जो पूरी रात चलेगा. इसमें पारंपरिक लोकगीत, नृत्य और फगुआ की तान गूंजेगी. आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि इतने विशाल आयोजन के बावजूद यहां किसी पुलिस बल या बाहरी सुरक्षा की आवश्यकता नहीं पड़ती. गांव के लोग स्वयं अनुशासित रहकर व्यवस्था संभालते हैं. बाहर से आने वाले अतिथियों के सत्कार में कोई कमी नहीं छोड़ते. स्थानीय विधायक वीरेंद्र कुमार ने भी इस ऐतिहासिक आयोजन को राजकीय महोत्सव का दर्जा दिलाने की मांग सरकार के समक्ष उठाई है.
फगुआ पोखर, जहां गुलाबी हो जाता है पानी
होली के मुख्य दिन दोपहर बाद गांव के तीनों टोलों की टोलियां पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ प्रसिद्ध फगुआ पोखर की ओर प्रस्थान करती हैं. परंपरा के अनुसार हजारों लोग अपनी पिचकारियों से पोखर के पानी को गुलाबी कर देते हैं. यह दृश्य न केवल आंखों को सुकून देता है, बल्कि भाईचारे का एक सशक्त संदेश भी देता है. गीत-संगीत की धुनों पर थिरकते ग्रामीण जब एक-दूसरे को गुलाल लगाते हैं, तो मिथिलांचल की यह धरती लघु वृंदावन प्रतीत होने लगती है. भीरहा की यह होली निश्चित रूप से आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है, जो बताती है कि आधुनिकता के दौर में भी अपनी जड़ों को कैसे सींचा जाता है.
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मैंने अपने 12 वर्षों के करियर में इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम किया है। मेरा सफर स्टार न्यूज से शुरू हुआ और दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर डिजिटल और लोकल 18 तक पहुंचा। रिपोर्टिंग से ले…और पढ़ें
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