बैठकी होली की शुरुआत बसंत पंचमी से मानी जाती है. इस दिन से गांव और मोहल्ले के पुरुष एक स्थान पर एकत्र होकर होली गीत गाते हैं. हारमोनियम और तबले की संगत में गाए जाने वाले ये गीत कई-कई घंटों तक चलते हैं. किसी भी तरह का उग्र व्यवहार नहीं किया जाता, बल्कि पूरी होली अनुशासन और सामूहिकता के साथ मनाई जाती है. होली से कुछ दिन पहले चीर बंधन की परंपरा होती है. गांव के बीच एक पेड़ या खंभे पर रंगीन कपड़ों की चीर बांधी जाती है.
खड़ी होली का स्वरूप थोड़ा अलग और अधिक ऊर्जावान होता है. इसमें होल्यार सफेद कुर्ता-पाजामा पहनकर ढोल और हुड़का की थाप पर नृत्य करते हैं. यह टोली घर-घर जाकर होली के गीत गाती है, लोगों को आशीर्वाद देती है. इस दौरान किसी भी तरह का उग्र व्यवहार नहीं किया जाता, बल्कि पूरी होली अनुशासन और सामूहिकता के साथ मनाई जाती है.
सफेद रंग क्यों खास
कुमाऊं की पुरुषों की होली में सफेद रंग को खास महत्त्व दिया जाता है. सफेद वस्त्र शुद्धता, सादगी और समानता का प्रतीक माने जाते हैं. जब इन सफेद कपड़ों पर अबीर और गुलाल पड़ता है, तो रंग और भी सुंदर और गहरे दिखाई देते हैं. यह संदेश देता है कि सभी होल्यार समान हैं, चाहे उनका सामाजिक या आर्थिक दर्जा कुछ भी हो. होली से कुछ दिन पहले चीर बंधन की परंपरा निभाई जाती है. गांव के बीच एक पेड़ या खंभे पर रंगीन कपड़ों की चीर बांधी जाती है. यह बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक मानी जाती है. इसके बाद होली के दिन तक बैठकी और खड़ी होली का सिलसिला चलता रहता है.
ब्रज से कनेक्शन
मान्यता है कि कुमाऊं की होली की जड़ें ब्रज क्षेत्र से जुड़ी हैं. सदियों पहले यह परंपरा पहाड़ों तक पहुंची और यहां की संस्कृति में रच-बस गई. आज यही कारण है कि कुमाऊं की पुरुषों की होली आस्था, संगीत और परंपरा का अनोखा संगम बन चुकी है. बागेश्वर जैसे क्षेत्रों में यह परंपरा आज भी पूरे सम्मान के साथ निभाई जाती है. बुजुर्गों से लेकर युवा पीढ़ी तक इसमें भाग लेती है, जिससे यह लोकसंस्कृति पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ रही है.
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Priyanshu has more than 10 years of experience in journalism. Before News 18 (Network 18 Group), he had worked with Rajsthan Patrika and Amar Ujala. He has Studied Journalism from Indian Institute of Mass Commu…और पढ़ें
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