विदेशी कीवी की जबरदस्त आवक और कम कीमत ने स्थानीय उत्पादकों के लिए गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है. स्थानीय उत्पादों के व्यापारी विरेंद्र सिंह ने लोकल 18 को बताया कि पिछले कुछ महीनों में ईरानी कीवी ने लगभग हर बड़ी मंडी में दबदबा बना लिया है. ईरान में बड़े पैमाने पर उत्पादन और कम लागत के चलते यह फल भारतीय बाजार में सस्ता मिल रहा है. स्थानीय कारोबारी हरीश सिंह बताते हैं कि जहां पिछले साल बागेश्वर की कीवी 250 से 275 रुपये प्रति किलो बिकती थी, वहीं इस बार कीमतें गिरकर 200 से 210 रुपये प्रति किलो पर आ गई हैं. यानी सीधे तौर पर किसानों की आमदनी 50 से 75 रुपये प्रति किलो तक कम हो गई है, जो छोटे किसानों के लिए काफी बड़ा झटका है.
कम दाम पर माल बेचने को मजबूर किसान
वहीं, उपभोक्ताओं के लिए यह कीमत गिरावट राहत की खबर है, क्योंकि कीवी जैसा पौष्टिक फल सस्ते दाम पर आसानी से उपलब्ध हो रहा है, लेकिन दूसरी ओर, किसान इस स्थिति को लेकर खासे चिंतित हैं. कीवी उत्पादक भवान सिंह कोरंगा बताते हैं कि सीजन की शुरुआत में उन्हें उम्मीद थी कि बाजार इस बार भी लाभ देगा, लेकिन जैसे ही बाहरी मंडियों से डिमांड घटी, भाव अचानक गिरने लगे. उनका कहना है कि कीमतों में गिरावट के चलते कई किसानों को मजबूरन कम दाम पर अपना माल बेचना पड़ा, जिससे आय पर सीधा असर पड़ा है.
स्थानीय किसान हयात सिंह का मानना है कि ईरानी कीवी के कम दाम और बड़े आकार ने बाजार की धारणा बदल दी है. कई व्यापारी सिर्फ कीमत देखकर ईरानी माल उठा रहे हैं, जबकि गुणवत्ता और स्वाद के मामले में पहाड़ी कीवी अभी भी बेहतर मानी जाती है. किसान यह भी कहते हैं कि यदि सरकारी स्तर पर स्थानीय उत्पादों को ब्रांडिंग, परिवहन सब्सिडी और विपणन सहायता मिले तो वे आसानी से विदेशी कीवी से मुकाबला कर सकते हैं.
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सीजन के अंत में मिल सकती है राहत
इस बीच, मंडी से जुड़े जानकारों का मानना है कि सीजन के अंतिम चरण में कीमतें एक बार फिर चढ़ सकती हैं. क्योंकि दिसंबर-जनवरी के बाद ईरानी कीवी की बड़ी खेप खत्म होने लगती है, जबकि बागेश्वर की कीवी देर तक टिकाऊ मानी जाती है. ऐसे में सीजन के अंत में स्टॉक कम होने पर किसानों को कीमतों में थोड़ी बढ़ोतरी की उम्मीद है. हालांकि वास्तविक राहत तभी मिलेगी जब बाजार में स्थानीय उत्पादकों को स्थायी समर्थन और संरक्षित मूल्य मिले. कुल मिलाकर विदेशी फलों की बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने बागेश्वर के किसानों को बाजार के असंतुलन से जूझने पर मजबूर कर दिया है. अगर यही स्थिति रही तो आने वाले समय में पहाड़ की कीवी खेती पर बड़ा खतरा मंडरा सकता है.
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