Bageshwar Holi News: कुमाऊं के पहाड़ों में होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि आपसी एकता का प्रतीक है. बागेश्वर में निभाई जाने वाली ‘चीरबंधन’ की परंपरा दिखाती है कि कैसे कपड़े का एक छोटा सा टुकड़ा पूरे गांव को एक सूत्र में बांध देता है. रंगभरी एकादशी से शुरू होने वाली इस रस्म में हर घर की भागीदारी क्यों जरूरी है और कैसे चीर का एक अंश साल भर घर की रक्षा करता है, जानिए इस प्राचीन और अनोखी सांस्कृतिक विरासत की पूरी कहानी.
चीरबंधन पहाड़ की होली की एक महत्वपूर्ण धार्मिक और सामाजिक परंपरा है. इस दिन गांव के लोग अपने-अपने घरों से कपड़े का एक छोटा टुकड़ा लेकर निर्धारित स्थान पर आते हैं. यह स्थान अक्सर किसी बुजुर्ग, ग्राम प्रधान या मंदिर परिसर का आंगन होता है. सभी कपड़ें के टुकड़ों को मिलाकर लकड़ी के लंबे डंडे या खंभे पर सबसे ऊपर बांधा जाता है. यह सामूहिक बंधन गांव की एकता और सहभागिता का प्रतीक माना जाता है. हर परिवार का इसमें शामिल होना जरूरी होता है, ताकि पूरे गांव पर सुख-समृद्धि की कृपा बनी रहे, कोई भी घर इस शुभ कार्य से वंचित न रहे.

बागेश्वर के स्थानीय जानकार व जिला पंचायत सदस्य जनार्दन लोहनी ने लोकल 18 को बताया कि चीरबंधन की रस्म रंगभरी एकादशी के दिन निभाई जाती है. इसी दिन से पहाड़ में होली के रंग और भी गहरे हो जाते हैं. गांव के पुरुष, महिलाएं और बच्चे पारंपरिक वेशभूषा में एकत्रित होकर होली गीत गाते हैं. ढोल-दमाऊं और लोकधुनों के बीच चीर को विधिवत बांधा जाता है. यह दिन धार्मिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इसे शुभ कार्यों की शुरुआत के लिए अच्छा समय समझा जाता है. चीरबंधन के बाद होली का उत्सव और अधिक उत्साह के साथ आगे बढ़ता है.

चीरबंधन की सबसे खास बात यह है कि इसमें गांव के हर घर की भागीदारी होती है. चाहे परिवार छोटा हो या बड़ा, हर घर से कपड़े का टुकड़ा लाना परंपरा का हिस्सा है. इससे यह संदेश जाता है कि गांव की खुशहाली सबकी साझा जिम्मेदारी है. अगर किसी कारणवश कोई परिवार शामिल नहीं हो पाता, तो उसे बाद में भी कपड़ा जोड़ने का अवसर दिया जाता है. इस सामूहिक भागीदारी से गांव में भाईचारा मजबूत होता है. लोग आपसी मतभेद भुलाकर एक साथ खड़े होते हैं, त्योहार को मिलजुल कर मनाने का संकल्प लेते हैं.
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चीर को लकड़ी के लंबे डंडे पर सबसे ऊपर बांधने के पीछे भी प्रतीकात्मक महत्व है. इसे गांव की रक्षा और ऊंचे आदर्शों का संकेत माना जाता है. डंडा अक्सर किसी खुले स्थान या आंगन में गाड़ा जाता है, ताकि वह पूरे गांव को दिखाई दे. इससे यह भाव प्रकट होता है कि गांव की एकता सबसे ऊपर है. यह बुराइयों को दूर रखने और सकारात्मक ऊर्जा को आमंत्रित करने का प्रतीक भी है. चीरबंधन का यह दृश्य पूरे गांव में उत्साह और धार्मिक आस्था का माहौल बना देता है.

जब गांव में होली गाने की परंपरा शुरू होती है, तो यह चीरबंधन भी टोली के साथ जाता है. जिस-जिस घर में होली गाई जाती है, वहां यह चीर भी ले जाया जाता है. इसे आशीर्वाद और शुभ संकेत के रूप में देखा जाता है. घर के लोग चीर को प्रणाम करते हैं और होली गाने वालों का स्वागत करते हैं. इससे यह विश्वास जुड़ा है कि जहां चीर पहुंचेगा, वहां सुख-शांति और समृद्धि बनी रहेगी. इस तरह चीर पूरे गांव को एक सूत्र में बांधने का काम करता है, त्योहार की भावना को हर घर तक पहुंचाता है.

पहाड़ में होली के अंतिम चरण को छलेड़ी कहा जाता है. इसी दिन चीर से जुड़े कपड़ों का विशेष अनुष्ठान किया जाता है. परंपरा के अनुसार चीर के आधे कपड़ों को अग्नि में समर्पित कर दिया जाता है. इसे बुराइयों, नकारात्मकता और कष्टों के अंत का प्रतीक माना जाता है. अग्नि में अर्पण करने से यह विश्वास है कि गांव की सारी बाधाएं दूर हो जाती हैं. यह रस्म पूरे गांव की मौजूदगी में संपन्न होती है, लोग इसे बड़े श्रद्धाभाव से निभाते हैं. छलेड़ी का यह दिन होली पर्व के समापन का संकेत भी देता है.

चीर के शेष बचे कपड़ों को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर गांव के हर घर में बांटा जाता है. लोग इसे अपने घर में सुरक्षित स्थान पर रखते हैं. मान्यता है कि यह कपड़ा पूरे वर्ष घर की रक्षा करता है, सुख-समृद्धि लाता है. कुछ परिवार इसे पूजा स्थान में रखते हैं तो कुछ लोग खेत या अनाज भंडार में भी रखते हैं. यह विश्वास पीढ़ियों से चला आ रहा है कि चीर का यह अंश घर में सकारात्मक ऊर्जा बनाए रखता है. इसी कारण इसे बहुत आदर और श्रद्धा के साथ संभालकर रखा जाता है.

चीरबंधन केवल कपड़े का बंधन नहीं, बल्कि गांव की सामूहिक एकता, आस्था और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है. आधुनिक समय में जहां कई परंपराएं समाप्त हो रही हैं, वहीं पहाड़ के गांव आज भी इस रिवाज को पूरी श्रद्धा से निभा रहे हैं. यह परंपरा लोगों को जोड़ने और सामाजिक समरसता बनाए रखने का काम करती है. होली के बहाने गांव में मेलजोल बढ़ता है और पुरानी परंपराएं नई पीढ़ी तक पहुंचती हैं. यही कारण है कि पहाड़ की होली अपनी सादगी, संस्कृति और सामूहिक भावना के लिए विशेष पहचान रखती है.
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