भोपाल-जबलपुर हाईवे से महज 8 किमी अंदर होशंगाबाद रोड पर बसा अमरावत कला आज भले ही अनाज का बड़ा व्यापारिक केंद्र बन चुका हो, लेकिन इसकी जड़ें 500 साल पुरानी अंबापुरी में छिपी हैं। प्राचीन जैन ग्रंथों और खुदाई में मिली 940 ई. तथा 1260 ई. की प्रतिमाओं से पता चलता है कि कभी यहां जैन समुदाय की समृद्ध बस्ती थी। आज भी जब कहीं गड्ढा खोदो तो जैन मूर्तियां निकल आती हैं। कई प्रतिमाएं रायसेन-विदिशा संग्रहालय और बाड़ी कला के आदिनाथ मंदिर में सुरक्षित हैं। गांव के बुजुर्ग आज भी उस प्राचीन तालाब को याद कर आह भरते हैं।
पूर्व सरपंच शंकर लाल कुशवाह बताते हैं कि आजादी के बाद जब मध्य प्रदेश बना और 60-70 साल पहले ग्राम पंचायत बनी, तब यह तालाब इतना खूबसूरत था कि दूर-दूर से लोग देखने आते थे। चारों तरफ पत्थर की फट्टा, लोहे की चिप लगी घाट, बढ़, पीपल, नीम और बरगद के घने वृक्ष थे। लेकिन उस समय खेती ही एकमात्र सहारा थी। उपज कम होती थी। गांव गरीब था।
कुछ दबंगों ने तालाब के पत्थर निकाल लिए। घाट तोड़ दिए। आज भी तालाब के बीचों-बीच एक छोर से दूसरे छोर तक विशाल पत्थर पड़ा है, जो उस सुनहरे दौर का गवाह है। खुदाई के दौरान निकली मूर्ति। पूर्व समय में अमरावत कला पूरे क्षेत्र का केंद्र था। यहां मिडिल स्कूल था जिसमें 25-30 गांवों के बच्चे पढ़ने आते थे। एकमात्र अस्पताल भी यहीं था। आज गाँव आर्थिक रूप से मजबूत हो चुका है। धान, गेहूं के बाद मूंग की फसल से किसानों की कमाई दोगुनी-तिगुनी हो गई है। अनाज खरीदी का बड़ा केंद्र बन चुका है। व्यापार फल-फूल रहा है। सभी समुदाय के लोग मिल-जुल कर रहते हैं। भेदभाव नाममात्र को भी नहीं। प्राचीन हनुमान मंदिर आज भी हजारों भक्तों की आस्था का केंद्र है।
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