छत्तीसगढ़ में शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई) के तहत निजी स्कूलों में प्रवेश का नियम बदल दिया गया है। अब निजी स्कूलों की 25 प्रतिशत आरक्षित सीटों में गरीब परिवारों के बच्चों को नर्सरी के बजाय सिर्फ कक्षा-1 से ही प्रवेश मिलेगा। इससे राज्य सरकार सालान
इसके अनुसार ही निजी स्कूलों में 25 फीसदी सीटें गरीब बच्चों के लिए आरक्षित रहती हैं। स्कूल शिक्षा विभाग ने 12 साल पहले ऐसे परिवारों के बच्चों के लिए नर्सरी क्लास से ही आरटीई का प्रावधान किया था। इससे सभी निजी स्कूलों में नर्सरी की 25 प्रतिशत सीट आरटीई में आरक्षित हो गई थी। लेकिन नए बदलावों के बाद नए सत्र से सिर्फ कक्षा पहली में प्रवेश होगा।
इस बदलाव से बड़ी संख्या में गरीब परिवारों के बच्चे अब कक्षा-1 से पहले स्कूल ही नहीं जा पाएंगे। क्योंकि जो पैरेंट्स फीस देने में सक्षम होंगे वे निजी स्कूलों में प्री-प्राइमरी में दाखिला दिलाएंगे। लेकिन, जो सक्षम नहीं होंगे उनके पास महिला बाल विकास विभाग से संचालित बालवाड़ी का विकल्प ही बचेगा। अधिकांश सरकारी स्कूलों में नर्सरी की पढ़ाई नहीं है। सिर्फ कुछ ही आत्मानंद स्कूल में पीपी-1 और पीपी-2 है।
फायदा और नुकसान
- गरीबों पर 3 गुना बोझ, नर्सरी की फीस भरनी होगी।
- सरकार की 63 करोड़ की सालाना बचत होगी।
शिक्षाविदों की चिंता
- 3-6 साल के बच्चे पढ़ाई में पिछड़ेंगे।
- आत्मविश्वास कम होगा, ड्रॉपआउट का खतरा बढ़ेगा।
ऐसे समझें पैसे खर्च करने का गणित
इस सत्र में 6947 निजी स्कूलों में आरटीई के तहत 53 हजार से अधिक सीटें थीं। अब तक नर्सरी, केजी-1 और कक्षा-1 तीनों को एंट्री क्लास माना जाता था। चूंकि अधिकांश निजी स्कूलों में प्रवेश की शुरुआत नर्सरी से होती है, इसलिए कुल 53 हजार सीटों में से करीब 30 हजार सीटें नर्सरी स्तर की थीं। गरीब बच्चों की पढ़ाई के लिए सरकार निजी स्कूलों को प्रति छात्र 7 हजार रुपए प्रतिवर्ष की प्रतिपूर्ति करती थी। यदि नर्सरी में 30 हजार बच्चे आरटीई के तहत दाखिल होते हैं, तो केजी-2 तक इनकी कुल संख्या 90 हजार छात्र प्रति वर्ष हो जाती है। प्रति छात्र 7 हजार रुपए की दर से सरकार 63 करोड़ रुपये का खर्च करती थी।
भास्कर एक्सपर्ट- राजीव गुप्ता, शिक्षाविद
इस निर्णय का असर गरीब बच्चों पर पड़ेगा
बाल्यावस्था की शिक्षा 3-6 वर्ष सर्वाधिक महत्वपूर्ण होती है, जहां भाषा, व्यवहार और सीखने की नींव रखी जाती है। स्कूल शिक्षा विभाग के नए निर्देश से अब निजी स्कूलों में सिर्फ कक्षा-1 में प्रवेश होगा। इससे आर्थिक रूप से सक्षम वर्ग के बच्चे निजी स्कूलों में नर्सरी से पढ़ाई जारी रखेंगे, जबकि गरीब बच्चे के लिए यह मुश्किल होगा। इससे शैक्षणिक असमानता बढ़ेगी। नर्सरी, पीपी-1, पीपी-2 छोड़ने की स्थिति में बच्चे फोनिक्स, बुनियादी शब्दावली और कक्षा की दिनचर्या से वंचित रहेंगे।
इससे कक्षा-1 का अंग्रेजी माध्यम पाठ्यक्रम उनके लिए बोझिल हो जाएगा। ये छात्र समझ और भागीदारी में पिछड़ जाते हैं। इससे आत्मविश्वास की कमी और व्यवहार संबंधी समस्याएं पैदा होंगी। स्कूलों को रेमेडियल क्लासेस चलानी पड़ेंगी, लेकिन संसाधनों की कमी से यह संभव नहीं है। यह निर्णय बच्चों के माता-पिता पर मानसिक दबाव बढ़ाएगा और ड्रॉप-आउट की संभावना को बढ़ावा देगा।
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