दरअसल, हाल ही में मंदिर परिसर में चल रहे विकास कार्यों के दौरान आठ पिलर गिरने की घटना सामने आई थी। हालांकि, संबंधित मार्ग पहले से बंद होने के कारण कोई अप्रिय घटना नहीं हुई, लेकिन इस घटना ने प्रशासन को सतर्क कर दिया। इसके अलावा, श्रद्धालुओं की ओर से यह शिकायतें भी मिलती रही हैं कि मंदिर से जुड़े कुछ लोग अपने परिचितों को बिना लाइन के दर्शन करा देते हैं, जिससे अव्यवस्था फैलती है। पीतांबरा पीठ की अध्यक्षता भाजपा की कद्दावर नेता और राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के पास है। ऐसे में समिति गठन को केवल प्रशासनिक कदम न मानकर राजनीतिक नजरिए से भी देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि इस समिति के जरिए शासन पीतांबरा पीठ पर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है, जिससे पीठ पर वसुंधरा राजे की भूमिका कमजोर हो सके।
समिति गठन के बाद पीतांबरा पीठ से जुड़े ट्रस्ट और उससे जुड़े लोग खासे नाखुश नजर आ रहे हैं। उनका कहना है कि पीठ की व्यवस्थाएं वर्षों से ट्रस्ट के माध्यम से सुचारू रूप से संचालित हो रही हैं और प्रशासन का इस तरह हस्तक्षेप करना परंपराओं और ट्रस्ट की स्वायत्तता के खिलाफ है। इस पूरे मामले पर दतिया कलेक्टर स्वप्निल वानखेड़े ने स्पष्ट किया है कि शासन-प्रशासन का पीतांबरा पीठ के ट्रस्ट के कामकाज में हस्तक्षेप करने का कोई इरादा नहीं है। कलेक्टर का कहना है कि प्रशासन का उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना है कि मंदिर में होने वाले निर्माण कार्य गुणवत्ता पूर्ण हों और श्रद्धालुओं के दर्शन की व्यवस्था बेहतर और सुरक्षित रहे। उन्होंने यह भी कहा कि यदि मंदिर प्रबंधन या ट्रस्ट के लोग समिति में शामिल होना चाहें, तो प्रशासन इसके लिए भी तैयार है।
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वहीं, इस मामले में कानून के जानकारों ने प्रशासन के कदम पर सवाल खड़े किए हैं। दतिया के वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक सिजरिया का कहना है कि जिला प्रशासन द्वारा इस तरह समिति गठित करना नियमों के विपरीत है। उनका कहना है कि भले ही प्रशासन इसे व्यवस्था सुधारने का कदम बता रहा हो, लेकिन हकीकत यह है कि इसके जरिए पीतांबरा पीठ पर शिकंजा कसने की तैयारी की जा रही है। अधिवक्ता का आरोप है कि समिति की आड़ में शासन पीठ पर अपनी पकड़ बनाना चाहता है और वसुंधरा राजे की भूमिका को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है।
फिलहाल, पीतांबरा पीठ का यह मामला आस्था, प्रशासन और राजनीति के त्रिकोण में फंसा नजर आ रहा है। एक ओर प्रशासन इसे श्रद्धालुओं की सुरक्षा और व्यवस्थाओं से जोड़कर देख रहा है, तो दूसरी ओर पीठ से जुड़े लोग और कानून विशेषज्ञ इसे सत्ता की दखलअंदाजी और राजनीतिक मंशा से जोड़ रहे हैं।
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