जाड़े की विदाई और बसंत के स्वागत के लिए मनाया जाता है लोक उत्सव
संवाद न्यूज एजेंसी
मंडी। पांगणा में होली के रूप में मनाया जाने वाला पारंपरिक फाग उत्सव आस्था, लोकसंस्कार और सामूहिक उल्लास का अनुपम उदाहरण है। शीत ऋतु की विदाई और ग्रीष्म के स्वागत का संदेश देने वाला यह पर्व बदलती जीवनशैली के बावजूद आज भी अपनी पारंपरिक गरिमा और धार्मिक आभा के साथ जीवंत बना हुआ है।
छोटी होली के दिन चील, पाजे और दारुहरिद्रा की हरी टहनियां ‘फू करो फागा रे फगैरूओ’ के मंगल उद्घोष के साथ घर लाई गईं। फाग के दिन विशेष पकवान तैयार किए गए। पूजा कक्ष में लाल मिट्टी से वर्गाकार लिपाई कर चावल की ढेरी पर भगवान गणेश की स्थापना की गई। इस मंडप में ग्राम देवता, स्थान देवता, इष्ट देवता और जोगणियों का आह्वान कर बसंत और सरसों के पुष्पों से सजावट की गई। परिवार के सभी सदस्यों ने श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना की।
होली पूजन के बाद नगरवासी सामूहिक फाग खेलने के लिए सुकेत अधिष्ठात्री मां राज-राजेश्वरी महामाया मंदिर, पांगणा पहुंचे। ढोल, नगाड़ों, करनाल और बैंड-बाजों की गूंज से वातावरण भक्तिमय हो उठा। बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी आयु वर्ग के लोग गुलाल उड़ाकर उत्सव में सराबोर हो गए। मंदिर के बाजंत्रियों ने गांव के प्रत्येक घर-आंगन में पहुंचकर ढोल, नगाड़े और शहनाई की पारंपरिक देवधुनें प्रस्तुत कीं।
रात्रि में शुभ मुहूर्त के अनुसार आंगन में चीड़ और पाजे की टहनियों को सूखी घास व लकड़ियों के साथ सजाकर अग्नि प्रज्वलित की गई। पूजा कक्ष में स्थापित कशमल और पाजे की टहनियों को अग्निदेव को अर्पित किया गया। लकड़ी की तलवार से आटे के बकरे की प्रतीकात्मक बलि देकर अग्नि में आहुति दी गई। सुकेत संस्कृति साहित्य एवं जन-कल्याण मंच के अध्यक्ष डॉ. हिमेंद्र बाली, डॉ. जगदीश शर्मा और रमेश शास्त्री ने कहा कि पारंपरिक फाग को पुनर्जीवित करना समय की आवश्यकता है।
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