Jya Tea Recipe: उत्तराखंड के ऊंचाई वाले इलाकों में भोटिया समुदाय की पारंपरिक नमकीन चाय ज्या सदियों से पहाड़ी जीवनशैली का अहम हिस्सा रही है. यह चाय सामान्य मीठी चाय से अलग होती है क्योंकि इसमें चीनी की जगह नमक और घी या मक्खन इस्तेमाल होता है. ठंडे और कठिन हिमालयी क्षेत्रों में ज्या शरीर को गर्म रखने और ऊर्जा देने का काम करती है. पारंपरिक तरीके से लकड़ी के बर्तन और मथानी में तैयार की जाने वाली ज्या आज भी भोटिया समुदाय की सांस्कृतिक पहचान और स्वास्थ्य का प्रतीक बनी हुई है.
ज्या (Jya) उत्तराखंड के भोटिया जनजाति की पारंपरिक नमकीन चाय है, जो सदियों से पहाड़ी जीवनशैली का अहम हिस्सा रही है. यह चाय आम मीठी चाय से बिल्कुल अलग होती है, क्योंकि इसमें चीनी की जगह नमक और घी या मक्खन का उपयोग किया जाता है. ठंडे और दुर्गम हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए ज्या केवल पेय नहीं, बल्कि ऊर्जा का स्रोत रही है. कठिन मौसम और लंबे पैदल सफर में यह चाय शरीर को गर्म रखने के साथ ताकत भी देती है. यही वजह है कि आज भी भोटिया समुदाय में इसका खास स्थान है.

ज्या मुख्य रूप से उत्तराखंड के ऊंचाई वाले इलाकों में बनाई जाती है. चमोली जिले की नीति घाटी, पिथौरागढ़ और धारचूला क्षेत्र में रहने वाले भोटिया समुदाय में यह चाय रोजमर्रा की दिनचर्या का हिस्सा है. साथ ही बागेश्वर में रहने वाले कुछ भोटिया समुदाय के लोग इसे बनाकर पीते हैं. इसके अलावा हिमाचल प्रदेश और सिक्किम के कुछ पहाड़ी इलाकों में भी इसी तरह की नमकीन चाय मिलती है, जिसे वहां ‘नून चाय’ या ‘पो चा’ कहा जाता है. अलग-अलग नाम होने के बावजूद इन सभी चायों का उद्देश्य एक ही है, ठंड में शरीर को गर्म रखना और ऊर्जा देना.

ज्या का स्वाद पहली बार पीने वालों को चौंका सकता है, क्योंकि यह नमकीन होती है. लेकिन पहाड़ों में रहने वाले लोग इसे सेहत के लिए बेहद फायदेमंद मानते हैं. नमक और घी शरीर में ऊर्जा बनाए रखते हैं, जबकि चाय की खास पत्ती पाचन को बेहतर करती है. सर्दियों में जब तापमान शून्य के करीब पहुंच जाता है, तब यह चाय शरीर को अंदर से गर्म रखने का काम करती है. यही कारण है कि भोटिया समुदाय के बुजुर्ग इसे औषधीय पेय भी मानते हैं.
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ज्या की सबसे खास बात इसमें इस्तेमाल होने वाली चाय पत्ती है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘धुनेर’ कहा जाता है. यह पत्ती आम बाजार में मिलने वाली चाय से अलग होती है, और पहाड़ी क्षेत्रों में ही पाई जाती है. धुनेर पत्ती को लंबे समय तक उबाला जाता है, जिससे इसका रंग और स्वाद गहरा हो जाता है. यही पत्ती ज्या को विशिष्ट सुगंध और औषधीय गुण देती है. स्थानीय लोग इसे ठंड से बचाव का प्राकृतिक उपाय मानते हैं.

ज्या बनाने की विधि भी उतनी ही खास है जितनी इसकी सामग्री. पारंपरिक तौर पर इसे लकड़ी के बर्तन में तैयार किया जाता है, जिसे स्थानीय लोग पीढ़ियों से इस्तेमाल करते आ रहे हैं. उबली हुई चाय में नमक और घी या मक्खन डालकर इसे लकड़ी के मथानी जैसे बर्तन में फेंटा जाता है. इससे चाय में झाग बनता है और सभी तत्व अच्छी तरह मिल जाते हैं. यही पारंपरिक तरीका ज्या के असली स्वाद को बनाए रखता है.

सर्दियों में ज्या को अक्सर सत्तू के साथ पिया जाता है. सत्तू कार्बोहाइड्रेट और फाइबर से भरपूर होता है, जबकि ज्या में मौजूद घी और नमक शरीर को तुरंत ऊर्जा देते हैं. दोनों का मेल लंबे समय तक शरीर को गर्म और ताकतवर बनाए रखता है. पहाड़ों में कामकाज और पशुपालन करने वाले लोग सुबह के नाश्ते में ज्या और सत्तू को जरूरी मानते हैं. यह संयोजन ठंड और थकान दोनों से बचाव करता है.

आमतौर पर लोग मीठी चाय को ही सेहत के लिए नुकसानदायक मानते हैं, लेकिन ज्या इस धारणा को तोड़ती है. इसमें चीनी नहीं होती, जिससे यह डायबिटीज के मरीजों के लिए भी बेहतर मानी जाती है. नमक और घी संतुलित मात्रा में होने पर शरीर को नुकसान नहीं पहुंचाते. यही कारण है कि पहाड़ों में ज्या को ‘स्वस्थ चाय’ कहा जाता है. यह न केवल स्वाद में अलग है, बल्कि सेहत के नजरिए से भी खास है.

तेजी से बदलती जीवनशैली के बावजूद ज्या आज भी भोटिया समुदाय की पहचान बनी हुई है. यह चाय उनकी संस्कृति, खानपान और प्रकृति से जुड़े जीवन का प्रतीक है. सर्दियों में परिवार और मेहमानों को ज्या पिलाना सम्मान की निशानी माना जाता है. अब धीरे-धीरे पर्यटक और युवा पीढ़ी भी इस अनोखी चाय को जानने और अपनाने लगे हैं. ज्या न सिर्फ एक पेय है, बल्कि पहाड़ों की जीवंत परंपरा का स्वाद है.