सुप्रीम कोर्ट ने सागर से जुड़े एक दुष्कर्म केस में आरोपी की 10 साल की दोषसिद्धि और सजा को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि यह ऐसा मामला है, जिसमें आपसी सहमति से बने रिश्ते को गलतफहमी के कारण आपराधिक रूप दे दिया गया।
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने कहा कि परिस्थितियों को देखते हुए यह एक दुर्लभ मामला है। यहां सजा देने के बजाय संबंधों को सुलझाने से न्याय पूरा हुआ। बेंच ने फैसले में कहा कि जब मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने आया, तो तथ्यों को देखकर अदालत को एक तरह की ‘छठी इंद्री (सिक्स्थ सेंस)’ से महसूस हुआ कि यदि दोनों पक्ष चाहें, तो वे विवाह के जरिए दोबारा एक हो सकते हैं।
कोर्ट ने माना कि आरोपी और शिकायतकर्ता महिला के बीच संबंध सहमति पर आधारित थे। संभव है कि शादी की तारीख आगे बढ़ने से महिला में असुरक्षा की भावना पैदा हुई, जिससे मामला आपराधिक रूप ले बैठा। कोर्ट ने कहा कि रिश्ते में आई अस्थायी दरार और गलतफहमी को अपराध में बदल देना उचित नहीं था।
काेर्ट के कहने पर आरोपी और महिला शादी कर चुके
- आरोपी और महिला की पहचान 2015 में सोशल मीडिया से हुई। दोस्ती बढ़ने पर सहमति से शारीरिक संबंध बने। महिला का आरोप है कि ये संबंध शादी के वादे पर आधारित थे।
- शादी में देरी के बाद नवंबर 2021 में महिला ने दुष्कर्म का केस दर्ज कराया। अप्रैल 2024 में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को 10 साल की सजा और जुर्माना दिया। हाई कोर्ट से राहत नहीं मिली, मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
- सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने माता-पिता की मौजूदगी में दोनों से बातचीत की। दोनों ने शादी की इच्छा जताई, जिसके बाद कोर्ट ने आरोपी को अंतरिम जमानत दी।
- अंतरिम जमानत के दौरान जुलाई 2025 में दोनों ने शादी कर ली। कोर्ट ने रिकॉर्ड किया कि वे तब से साथ रह रहे हैं और दोनों परिवार इस रिश्ते से संतुष्ट हैं।
- कोर्ट ने यह भी माना कि आरोपी को मामले और सजा के कारण नौकरी से निलंबित कर दिया गया था। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सागर के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमएचओ) को निलंबन आदेश वापस लेने और आरोपी को बकाया वेतन देने के निर्देश दिए।